दुबई: वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है. दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने तेल निर्यातक देशों के शक्तिशाली समूह ‘ओपेक’ (OPEC) और ‘ओपेक प्लस’ से बाहर होने का आधिकारिक एलान कर दिया है. यूएई 1 मई 2026 से इस समूह का हिस्सा नहीं रहेगा. करीब 65 साल पुराने इस गठबंधन से बाहर निकलने का फैसला न केवल अरब जगत बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला माना जा रहा है.
फैसले की मुख्य वजह, उत्पादन की आजादी
विशेषज्ञों के अनुसार, यूएई पिछले काफी समय से ओपेक द्वारा लगाए गए ‘प्रोडक्शन कोटा’ (उत्पादन सीमा) से असंतुष्ट था. ओपेक अक्सर कच्चे तेल की कीमतों को ऊंचा बनाए रखने के लिए अपने सदस्य देशों को उत्पादन कम रखने का निर्देश देता है. दूसरी ओर, यूएई ने अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है. वह 2027 तक रोजाना 5 मिलियन बैरल तेल उत्पादित करने का लक्ष्य रखता है. ओपेक से बाहर होने के बाद, यूएई पर उत्पादन घटाने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं होगी और वह अपनी मर्जी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बेच सकेगा.
भारत पर क्या होगा असर?
यूएई के इस फैसले का भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है. भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा यूएई से पूरा करता है. जब यूएई बाजार में अधिक तेल की आपूर्ति करेगा, तो इससे कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने की संभावना बढ़ेगी. इससे भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर रह सकती हैं, जो महंगाई को नियंत्रित करने में मददगार साबित होगा.
वैश्विक बाजार की नई तस्वीर
यूएई वर्तमान में दुनिया का 7वां सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है. यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के मुताबिक, यूएई प्रतिदिन लगभग 4.16 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन करता है. इसके प्रमुख खरीदारों में चीन, जापान, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई दिग्गज शामिल हैं.
ओपेक से यूएई का बाहर जाना इस समूह के सबसे बड़े नेता सऊदी अरब के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है. कतर और अंगोला के बाद अब यूएई का बाहर निकलना यह संकेत देता है कि अब देश अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को समूह के हितों से ऊपर रख रहे हैं. दुनिया अब एक ऐसे दौर की ओर बढ़ रही है जहाँ तेल की कीमतों पर किसी एक समूह का एकाधिकार कम होगा और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी.


