Wednesday, May 27, 2026

भारतीय वैज्ञानिक ने JWST और Subaru टेलीस्कोप की मदद से 12.6 अरब साल पुरानी आकाशगंगाओं की विशाल संरचना Loktak Protocluster की खोज की है.

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क्या आपने कभी सोचा है कि जब हमारी पृथ्वी भी नहीं बनी थी, तब ब्रह्मांड कैसा दिखता था? इस सवाल का जवाब ढूंढने के चक्कर में भारत के एक वैज्ञानिक को बड़ी कामयाबी मिली है. मणिपुर के 29 वर्षीय खगोलशास्त्री डॉ. रोनाल्डो लाइशराम ने एक अंतरराष्ट्रीय टीम के साथ मिलकर ब्रह्मांड की सबसे पुरानी और विशाल संरचनाओं में से एक की खोज की है. इस खोज को The Astrophysical Journal Letters में पब्लिश किया गया है जो दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित खगोल विज्ञान पत्रिकाओं में से एक है.

Loktak Protocluster क्या है?

इस विशाल संरचना को Loktak Protocluster नाम दिया गया है. यह करीब 12.6 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित है. इसका मतलब है कि यह नया स्ट्रकचर यानी आकाशगंगाओं की दुनिया उस वक्त की है, जब ब्रह्मांड की उम्र सिर्फ 1.2 अरब साल थी. अब यह समझना ज़रूरी है कि Protocluster होता क्या है. सरल भाषा में कहें तो जब कई आकाशगंगाएं गुरुत्वाकर्षण की वजह से एक-दूसरे के पास आने लगती हैं और एक बड़ा समूह बनाती हैं, तो उसे Protocluster कहते हैं. यह उस स्टेज में होता है, जब आकाशगंगाओं का शहर बन ही रहा होता है. वैज्ञानिक इसे ‘आकाशगंगाओं का शहर’ भी कहते हैं. Loktak Protocluster में चार घने आकाशगंगा समूह एक विशाल ब्रह्मांडीय संरचना के भीतर जुड़े हुए पाए गए हैं.

कैसे हुई यह खोज?

यह खोज दो अत्याधुनिक दूरबीनों यानी मॉर्डन टेलीस्कोप की मदद से संभव हुई है, जो हवाई में स्थित है. इनमें से पहले का नाम James Webb Space Telescope यानी JWST है, जो अभी तक का सबसे शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीन माना जाता है और दूसरी है Subaru Telescope. इस नए आकाशगंगाओं के शहर को पहले Subaru Telescope से ही खोजा गया और फिर JWST की मदद से इसका विस्तृत अध्ययन किया गया.

JWST ने यह भी दिखाया कि भीड़भाड़ वाले इलाकों में मौजूद आकाशगंगाएं कम घने इलाकों की आकाशगंगाओं की तुलना में ज़्यादा फैली हुई हैं. यानी जब ब्रह्मांड सिर्फ 1.2 अरब साल का था, तभी से आसपास का माहौल आकाशगंगाओं के विकास को प्रभावित कर रहा था.

लोकतक झील से जुड़ा नाम का रिश्ता

डॉ. लाइशराम मणिपुर के थौबल ज़िले के खांगाबोक के रहने वाले हैं और फिलहाल जापान के National Astronomical Observatory of Japan यानी NAOJ में पोस्ट-डॉक्टरल रिसर्चर हैं. उन्होंने इस संरचना का नाम मणिपुर की प्रसिद्ध लोकतक झील के नाम पर रखा. लोकतक झील पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है जो अपने तैरते हुए फुमदियों यानी वनस्पति, मिट्टी और जैविक पदार्थ के तैरते द्वीपों के लिए दुनियाभर में मशहूर है. डॉ. लाइशराम ने कहा कि आकाशगंगाओं के इस जुड़े हुए समूह को देखकर उन्हें लोकतक झील की तैरती फुमदियां याद आ गईं और इसीलिए उन्होंने यह नाम चुना. उनके अनुसार यह उनकी ओर से मणिपुर को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है.

भारत और विज्ञान के लिए क्यों है यह खास?

आपको बता दें कि यह खोज सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है बल्कि भारत के लिए गर्व का पल भी है. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि आज जो विशाल आकाशगंगा समूह हम ब्रह्मांड में देखते हैं, वे कैसे बने. डार्क मैटर और आकाशगंगाओं के विकास को समझने में भी यह खोज अहम भूमिका निभा सकती है. इसके अलावा आने वाले समय में Subaru Telescope और JWST की मदद से और भी गहरे अध्ययन किए जाएंगे.

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