Monday, May 25, 2026

बगहा-दो प्रखंड में जीविका समूह की महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों के लिए पोशाक सिलकर आत्मनिर्भर बन रही हैं।

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बगहा। ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की सरकारी पहल अब जमीनी स्तर पर बदलाव की मजबूत तस्वीर पेश कर रही है।

बगहा-दो प्रखंड में जीविका समूह से जुड़ी महिलाएं सिर्फ पोशाक नहीं सिल रहीं, बल्कि अपने श्रम और हुनर से आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं।

आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों के लिए पोशाक निर्माण का जिम्मा मिलने के बाद यहां की महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होने के साथ सामाजिक बदलाव की वाहक भी बन रही हैं।

150 महिलाएं सक्रिय

बगहा दो में आंगनबाड़ी केंद्रों के करीब 15 हजार बच्चों के लिए 30 हजार सेट पोशाक तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस कार्य में जीविका समूह की करीब 150 महिलाएं सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

बच्चों की जरूरत और निर्धारित मानकों के अनुसार चार, पांच और छह वर्ष आयु वर्ग के लिए पोशाक तैयार की जा रही है। लड़कों के लिए हाफ शर्ट और फुल पैंट, जबकि लड़कियों के लिए दो शर्ट और स्कर्ट तैयार किए जा रहे हैं।

इस पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाने के लिए विभाग की ओर से कपड़ों की कटिंग कर जीविका कार्यालय को उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि सिलाई और फिनिशिंग का कार्य महिलाओं द्वारा किया जा रहा है।

प्रत्येक तैयार सेट पर 55 रुपये का भुगतान किया जा रहा है, जो ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का स्थायी स्रोत बन रहा है। अब तक 13,274 सेट पोशाक तैयार की जा चुकी है।

बगहा-दो के दुधौरा, सेमरा, हरनाटांड़ और वाल्मीकिनगर स्थित चार सिलाई केंद्र आज महिला सशक्तीकरण के केंद्र बन चुके हैं। यहां मशीनों की आवाज केवल उत्पादन का संकेत नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ते कदमों की पहचान बन गई है।

जीविका दीदि सावित्री देवी का कहना है कि पहले उनकी भूमिका केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थी, लेकिन प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़ने के बाद उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है।

अब वे परिवार की आय बढ़ाने के साथ बच्चों की शिक्षा और घरेलू जरूरतों में आर्थिक सहयोग भी कर रही हैं।हरनाटांड सिलाई केंद्र की जीविका दीदी कलावती देवी इस बदलाव की प्रेरक बनकर उभरी हैं।

वे महिलाओं को सिलाई का प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ रही हैं। उनके प्रयासों से कई महिलाएं कौशल सीखकर आज नियमित आय अर्जित कर रही हैं।

आंकड़ों में बदलाव की कहानी

30 हजार सेट पोशाक निर्माण का लक्ष्य:

  • 15 हजार आंगनबाड़ी बच्चे लाभान्वित
  • 13,274 सेट अब तक तैयार
  • 04 सिलाई केंद्र संचालित
  • 150 महिलाएं रोजगार से जुड़ीं
  • 55 रुपये प्रति सेट सिलाई पारिश्रमिक

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