नई दिल्ली: ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जो व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार, संवाद करने की क्षमता और व्यवहारिक पैटर्न को प्रभावित करती है। इसके लक्षण और गंभीरता हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है, इसलिए इसे “स्पेक्ट्रम” कहा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऑटिज्म के शुरुआती संकेत आमतौर पर बचपन में दिखाई देने लगते हैं। कई बच्चों में जीवन के पहले वर्ष के दौरान सामान्य विकास देखने को मिलता है, लेकिन 18 से 24 महीने के बीच कुछ बच्चे पहले से सीखे गए कौशल खोने लगते हैं और उनमें ऑटिज्म से जुड़े लक्षण उभर सकते हैं। समय पर पहचान और शुरुआती हस्तक्षेप (Early Intervention) बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
ऑटिज्म लड़कों में अधिक क्यों पाया जाता है?
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, ऑटिज्म के पीछे आनुवंशिक (जेनेटिक) और जैविक कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। यदि परिवार में पहले किसी सदस्य को ऑटिज्म रहा हो, तो इसके होने की संभावना बढ़ सकती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि विश्व स्तर पर किए गए अध्ययनों में लड़कों में ऑटिज्म का निदान लड़कियों की तुलना में अधिक देखा गया है। आमतौर पर पुरुष और महिला मरीजों का अनुपात 3:1 से 4:1 के बीच माना जाता है। यानी प्रत्येक एक लड़की के मुकाबले लगभग तीन से चार लड़कों में ऑटिज्म की पहचान होती है।
इसके पीछे माने जाने वाले प्रमुख कारण
1. आनुवंशिक सुरक्षा (Female Protective Effect)
वैज्ञानिकों का मानना है कि लड़कियों में मौजूद दो X क्रोमोसोम (XX) उन्हें कुछ हद तक आनुवंशिक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। इसके विपरीत लड़कों में केवल एक X और एक Y क्रोमोसोम (XY) होता है। इस वजह से लड़कियों में ऑटिज्म के लक्षण प्रकट होने के लिए अपेक्षाकृत अधिक गंभीर आनुवंशिक परिवर्तन आवश्यक हो सकते हैं।
2. हार्मोन का प्रभाव
कुछ शोधों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान पुरुष भ्रूण में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर अधिक होता है। “एक्सट्रीम मेल ब्रेन” सिद्धांत के अनुसार, यह हार्मोन मस्तिष्क के विकास को इस तरह प्रभावित कर सकता है कि ऑटिज्म से जुड़े कुछ व्यवहार, जैसे सीमित रुचियां और दोहराव वाले व्यवहार, अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दें।
3. लड़कियों में अलग तरह के लक्षण
विशेषज्ञों का कहना है कि लड़कियों में ऑटिज्म के लक्षण कई बार लड़कों से अलग होते हैं। लड़के अक्सर अधिक हाइपरएक्टिव या आक्रामक व्यवहार दिखा सकते हैं, जबकि कई लड़कियां सामाजिक परिस्थितियों में खुद को बेहतर ढंग से ढाल लेती हैं या अपने लक्षणों को छिपा लेती हैं। इसी कारण लड़कियों में ऑटिज्म का निदान कई बार देर से होता है या कुछ मामलों में पहचान ही नहीं हो पाती।
ऑटिज्म की समय पर पहचान क्यों जरूरी है?
हालांकि ऑटिज्म का कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती उम्र में इसकी पहचान हो जाए और उचित थेरेपी, विशेष शिक्षा तथा व्यवहार संबंधी सहायता दी जाए, तो बच्चों के सामाजिक, शैक्षणिक और दैनिक जीवन कौशल में उल्लेखनीय सुधार संभव है। इसलिए यदि किसी बच्चे में संवाद, व्यवहार या सामाजिक सहभागिता से जुड़े असामान्य संकेत दिखाई दें, तो बाल रोग विशेषज्ञ या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से समय रहते सलाह लेना महत्वपूर्ण माना जाता है।


