रांची: ऑल इंडिया ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी (AIOS) और झारखंड ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी (JHOS) के संयुक्त आयोजन में चल रहे 5वें AIOS मिड-टर्म सम्मेलन के दूसरे दिन आधुनिक नेत्र चिकित्सा और सर्जरी से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। देश-विदेश से पहुंचे विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक सत्रों, कार्यशालाओं और अकादमिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।
सम्मेलन का उद्देश्य नई चिकित्सा तकनीकों और शोध से जुड़ी जानकारी को चिकित्सकों तक पहुंचाने के साथ मरीजों के लिए सुरक्षित और सुलभ उपचार को बढ़ावा देना बताया गया। AIOS अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) जे. एस. तितियाल, महासचिव डॉ. संतोष जी. होनावर, वैज्ञानिक समिति की अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) नम्रता शर्मा, आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. बी. पी. कश्यप और आयोजन सचिव डॉ. भारती कश्यप समेत अन्य विशेषज्ञ मौजूद रहे।
मोतियाबिंद की जटिल सर्जरी पर मास्टरक्लास
दूसरे दिन मोतियाबिंद सर्जरी के दौरान आने वाली जटिलताओं और Posterior Capsular Rupture (PCR) के प्रबंधन पर विशेष मास्टरक्लास आयोजित हुई। विशेषज्ञों ने ट्राइफोकल और EDOF इंट्राओकुलर लेंस जैसी आधुनिक तकनीकों के व्यावहारिक पहलुओं पर भी अपने अनुभव साझा किए।
रेटिना सर्जरी, डायबिटिक रेटिनोपैथी के आधुनिक उपचार और आंखों की जांच में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल पर भी वैज्ञानिक चर्चा हुई।
बाल नेत्र चिकित्सा के सत्र में बच्चों में बढ़ते मायोपिया और अत्यधिक स्क्रीन टाइम से जुड़े प्रभावों पर विशेषज्ञों ने जानकारी दी।
युवा डॉक्टरों को दिया गया व्यावहारिक प्रशिक्षण
सम्मेलन में Surgical Skill Transfer Course (SSTC) और Diagnostic Skill Transfer Course (DSTC) जैसी हैंड्स-ऑन कार्यशालाएं भी आयोजित की गईं। इनका उद्देश्य युवा नेत्र चिकित्सकों को आधुनिक सर्जिकल और डायग्नोस्टिक तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना था।
इसके अलावा युवा डॉक्टरों के लिए ‘Residents Rumble’ राष्ट्रीय पीजी डिबेट, जटिल मामलों पर आधारित ‘Court Martial’ और ‘अजंता क्विज’ का भी आयोजन हुआ।
मोतियाबिंद में हर मरीज को तुरंत सर्जरी की जरूरत नहीं
AIOS की उपाध्यक्ष डॉ. चित्रा रामामूर्ति ने कहा कि आंखों में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर जांच कराना जरूरी है। उन्होंने बताया कि मोतियाबिंद में केवल धुंधला दिखना ही संकेत नहीं है। रात में रोशनी से चकाचौंध, तेज रोशनी में परेशानी और रंगों या वस्तुओं के बीच अंतर पहचानने में कठिनाई भी इसके संकेत हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ना, डायबिटीज और आंख में चोट इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। उनके अनुसार, मोतियाबिंद का पता चलने के बाद हर मरीज को तत्काल ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं होती। जब दृष्टि रोजमर्रा के काम, पढ़ाई, कामकाज या अन्य गतिविधियों में बाधा डालने लगे, तब सर्जरी पर विचार किया जाता है।
डॉ. रामामूर्ति ने बताया कि फेको और फेम्टोसेकंड लेजर आधारित तकनीकों से प्राकृतिक धुंधले लेंस को हटाकर कृत्रिम IOL लगाया जाता है। आधुनिक तकनीक सर्जरी में मदद करती है, लेकिन उपचार का निर्णय और अंतिम नियंत्रण नेत्र सर्जन के पास ही रहता है।
जरूरत के अनुसार चुना जाता है लेंस
विशेषज्ञ के अनुसार मरीज की जरूरत और आंख की स्थिति के आधार पर मोनोफोकल, मल्टीफोकल, ट्राइफोकल, EDOF या टॉरिक लेंस का चयन किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि सर्जरी के बाद सामान्यतः मोतियाबिंद वापस नहीं बनता। हालांकि कुछ मरीजों में Posterior Capsule Opacification (PCO) हो सकता है, जिसे आम बोलचाल में सेकेंडरी कैटरैक्ट कहा जाता है। इसका उपचार YAG लेजर प्रक्रिया से किया जा सकता है।
बच्चों की आंख में सफेद चमक को नजरअंदाज न करें
AIOS के महासचिव डॉ. संतोष जी. होनावर ने बच्चों की आंखों में दिखाई देने वाली असामान्य सफेद चमक को लेकर अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि तस्वीर खींचते समय या सामान्य स्थिति में पुतली में सफेद चमक दिखाई दे तो इसे केवल कैमरे के फ्लैश का प्रभाव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह रेटिनोब्लास्टोमा का शुरुआती संकेत हो सकता है।
उन्होंने बताया कि समय पर पहचान और उपचार से इस बीमारी में बच्चों की जान और आंखों को बचाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। उपचार के विकल्पों में कीमोथेरेपी, लेजर, क्रायोथेरेपी, थर्मोथेरेपी और अन्य विशेषज्ञ उपचार शामिल हो सकते हैं। बीमारी की स्थिति के अनुसार उपचार तय किया जाता है।
अभिभावकों को इन संकेतों पर ध्यान देने की सलाह दी गई:
- पुतली में सफेद चमक दिखाई देना
- अचानक भेंगापन आना
- बिना स्पष्ट कारण आंख में बार-बार लालिमा या सूजन
- बच्चे को कम दिखाई देना या आंख में दर्द की शिकायत
- पुतली या आइरिस के रंग में असामान्य बदलाव
ऐसे लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सक से जांच कराने की सलाह दी गई।
नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर
AIOS की वैज्ञानिक समिति की अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) नम्रता शर्मा ने कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए नेत्रदान की जरूरत पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि देश में हर वर्ष बड़ी संख्या में कॉर्निया ट्रांसप्लांट की आवश्यकता होती है और इसके लिए पर्याप्त नेत्रदान जरूरी हैं।
उनके अनुसार 2023-24 में 66,395 नेत्रदान हुए, जबकि लक्ष्य 75 हजार था। 2024-25 के लिए लक्ष्य बढ़ाकर 80 हजार किया गया था। उन्होंने नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने और कॉर्निया संबंधी बीमारी या गंभीर चोट में समय पर उपचार की आवश्यकता पर जोर दिया।
आंख में केमिकल जाए तो तुरंत पानी से धोने की सलाह
वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. हरबंस लाल ने आंख में चोट या केमिकल जाने की स्थिति में लापरवाही नहीं करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि केमिकल आंख में पड़ने पर उसे रगड़ने के बजाय तुरंत पर्याप्त साफ बहते पानी से धोना चाहिए और इसके बाद नेत्र विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि आंख में कंकड़ या धातु का टुकड़ा चला जाए तो उसे खुद निकालने या आंख रगड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
बच्चों में बढ़ते मायोपिया पर चिंता
डॉ. मोहन राजन ने बच्चों में मायोपिया को लेकर नियमित जांच और विशेषज्ञ की सलाह की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक स्क्रीन या किताब को बहुत करीब से देखने और आउटडोर गतिविधियां कम होने से बच्चों में मायोपिया बढ़ सकता है।
बच्चे का टीवी या स्क्रीन के बहुत पास बैठना, किताब को आंखों के करीब रखना, आंखें सिकोड़कर देखना, सिरदर्द या आंखों में थकान की शिकायत और स्कूल बोर्ड साफ न दिखाई देना जांच की जरूरत के संकेत हो सकते हैं।
उन्होंने बच्चों को रोजाना पर्याप्त समय खुले वातावरण में बिताने की सलाह दी और मायोपिया नियंत्रण के लिए उपलब्ध विकल्पों पर नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श लेने की बात कही।
ग्लूकोमा की शुरुआती पहचान जरूरी
सम्मेलन में ग्लूकोमा पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि शुरुआत में यह बीमारी बिना स्पष्ट लक्षण के भी ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचा सकती है। इसी वजह से नियमित आंखों की जांच को महत्वपूर्ण बताया गया।
सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीक, समय पर जांच, मरीजों में जागरूकता और युवा चिकित्सकों के कौशल विकास को नेत्र चिकित्सा के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में रेखांकित किया।
