रांची | 31 अक्टूबर 2026 | Bharat Superfast News
झारखंड में अब पौधरोपण और जलवायु अनुकूल खेती के जरिए किसानों तथा ग्रामीण समुदायों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर तैयार करने की पहल की जा रही है। राज्य के वन विभाग ने किसानों और आदिवासी समुदायों को कार्बन मार्केट से जोड़ने के लिए रोडमैप तैयार किया है। इसके तहत कृषि वानिकी और पर्यावरण अनुकूल खेती से कार्बन क्रेडिट अर्जित करने और उन्हें बेचकर आर्थिक लाभ प्राप्त करने की योजना है।
इस पहल पर शुक्रवार को रांची के होटल चाणक्य बीएनआर में आयोजित ‘क्लाइमेट रेसिलिएंट झारखंड’ कार्यशाला में चर्चा हुई। इस दौरान राज्य के लिए ‘क्लाइमेट हजार्ड मैपिंग फॉर झारखंड’ रिपोर्ट का भी विमोचन किया गया।
क्या है कार्बन ट्रेडिंग और कैसे होगी कमाई?
पेड़-पौधे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। वैज्ञानिक तरीकों से जब किसी परियोजना के जरिए वातावरण से हटाई गई या रोकी गई ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा का आकलन और सत्यापन किया जाता है, तो निर्धारित मानकों के तहत कार्बन क्रेडिट जारी किए जा सकते हैं।
इन क्रेडिट को कार्बन बाजार में खरीदा-बेचा जाता है। झारखंड में प्रस्तावित योजना के तहत किसान अपनी जमीन पर पेड़ लगाकर कृषि वानिकी को बढ़ावा दे सकते हैं। इसके साथ ही जलवायु अनुकूल खेती के तरीकों को अपनाकर कार्बन परियोजनाओं का हिस्सा बन सकते हैं।
यदि परियोजनाएं निर्धारित मानकों पर खरी उतरती हैं और उनके कार्बन क्रेडिट जारी होते हैं, तो किसानों और ग्रामीण समुदायों को उनकी बिक्री से अतिरिक्त आमदनी मिल सकती है।
झारखंड में 69 प्रतिशत भूमि क्षरण की चुनौती
कार्यशाला में प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख संजीव कुमार ने कहा कि कार्बन ट्रेडिंग पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका बढ़ाने का माध्यम बन सकती है।
उन्होंने इसरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि झारखंड में लगभग 69 प्रतिशत भूमि क्षरण की चुनौती है। इससे निपटने के लिए जल संरक्षण, पौधरोपण और बायोगैस जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरूरत है।
उन्होंने उद्योग, खनन और ऊर्जा विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों पर काम करने पर भी जोर दिया।
सैटेलाइट से होगी निगरानी, डिजिटल तकनीक से मापेंगे कार्बन
कार्यशाला में पीसीसीएफ (वाइल्डलाइफ) रवि रंजन ने कार्बन परियोजनाओं के विकास में वैज्ञानिक आंकड़ों के इस्तेमाल को जरूरी बताया।
वहीं, नाबार्ड के डीजीएम राकेश सिन्हा ने कहा कि योजनाओं और वित्तीय सहयोग के माध्यम से किसानों तक कार्बन फाइनेंस का लाभ पहुंचाने में मदद की जाएगी।
कार्यशाला में डिजिटल मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन (dMRV) तकनीक का प्रदर्शन भी किया गया। इसके जरिए उपग्रह चित्रों और अन्य वैज्ञानिक आंकड़ों की मदद से पेड़ों तथा मिट्टी में जमा कार्बन का आकलन और निगरानी की जा सकेगी।
कई संस्थानों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
कार्यशाला में पूर्व पीसीसीएफ डॉ. एचएस गुप्ता, पीसीसीएफ (वेटलैंड) एटी मिश्रा, डीएफओ अनुराधा मिश्रा और क्लाइमेटेक्स के निदेशक विजय सहित कई विशेषज्ञ मौजूद रहे।
इसके अलावा बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS), हिंडाल्को और एक्सएलआरआई के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।
किसानों के लिए क्या मायने रखती है यह पहल?
कार्बन ट्रेडिंग से जुड़ी यह पहल झारखंड के किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए आय के नए अवसर खोल सकती है। हालांकि, इसके लिए परियोजनाओं का पंजीकरण, कार्बन का वैज्ञानिक आकलन, स्वतंत्र सत्यापन और बाजार में क्रेडिट की बिक्री जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी।
इसलिए किसानों को होने वाली वास्तविक कमाई परियोजना की पात्रता, कार्बन क्रेडिट की मात्रा, बाजार मूल्य और संबंधित खर्चों पर निर्भर करेगी। योजना का रोडमैप तैयार होने के बाद इसके जमीनी क्रियान्वयन और किसानों की भागीदारी पर नजर रहेगी।
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