Tuesday, September 15, 2026

परिसीमन पर आदिवासी संगठनों की चिंता, राज्यपाल से मिले प्रतिनिधि; विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का सुझाव.

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रांची: झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन के संभावित प्रभावों को लेकर आदिवासी संगठनों ने चिंता जताई है। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि परिसीमन की प्रक्रिया में आदिवासी क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी जाए।

केवल वर्तमान जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का विरोध

प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि झारखंड में परिसीमन करते समय सिर्फ मौजूदा जनसंख्या के आंकड़ों को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। राज्य के पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों की स्थिति के साथ आदिवासी इलाकों की सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

संगठनों ने विस्थापन, पलायन और पिछले वर्षों में हुए जनसंख्या परिवर्तन को भी परिसीमन के आकलन में शामिल करने की मांग की है।

आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने की जताई आशंका

प्रतिनिधिमंडल ने आशंका जाहिर की कि परिसीमन के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों के अनुपात में बदलाव हो सकता है। इससे आदिवासी समाज के मौजूदा राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ने की संभावना है।

उन्होंने मांग की कि किसी भी स्थिति में अनुसूचित जनजाति के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी नहीं होनी चाहिए। यदि परिसीमन के बाद विधानसभा और लोकसभा की कुल सीटों में बढ़ोतरी होती है, तो उसी अनुपात में ST के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए।

विशेष सत्र बुलाकर प्रस्ताव पारित करने का सुझाव

राज्यपाल की ओर से प्रतिनिधिमंडल को सुझाव दिया गया कि इन मांगों को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष भी रखा जाए। साथ ही राज्य सरकार से परिसीमन के मुद्दे पर गंभीर चर्चा करने और विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर स्पष्ट प्रस्ताव पारित करने की दिशा में पहल करने को कहा गया।

प्रतिनिधिमंडल का सुझाव है कि विधानसभा से पारित प्रस्ताव को राज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार तक भेजा जा सकता है।

राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजने की मांग

आदिवासी संगठनों ने संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा-3 का उल्लेख करते हुए राज्यपाल से राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजने का आग्रह भी किया। रिपोर्ट में पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में हुए जनसंख्या परिवर्तन, विस्थापन और पलायन तथा परिसीमन के संभावित प्रभावों का विस्तृत अध्ययन शामिल करने की मांग की गई।

इसके अलावा प्रतिनिधिमंडल ने परिसीमन के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा। इसके लिए 8 मार्च 2019 को अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित विषयों के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति की तर्ज पर नई समिति बनाने का सुझाव दिया गया। समिति की रिपोर्ट को राज्यपाल की वार्षिक रिपोर्ट में शामिल कर राष्ट्रपति को भेजने की मांग भी रखी गई।

विस्थापन और पलायन को लेकर बंधु तिर्की ने रखी बात

बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड में खनन, बांध, उद्योग, बिजली परियोजनाओं, सड़क और रेल जैसी परियोजनाओं के कारण बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार विस्थापित हुए हैं। रोजगार के लिए भी अनेक आदिवासी युवा और परिवार दूसरे राज्यों में पलायन कर चुके हैं।

प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों को नजरअंदाज कर सिर्फ जनसंख्या के मौजूदा आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करना उचित नहीं होगा।

आदिवासी भूमि की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया

मुलाकात के दौरान आदिवासी भूमि की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया गया। प्रतिनिधिमंडल ने CNT और SPT एक्ट के प्रभावी अनुपालन तथा भूमि वापसी से जुड़े प्रावधानों को लागू करने की मांग की।

प्रतिनिधिमंडल में बंधु तिर्की, डॉ. बासवी किड़ो, शशि पन्ना, रमा खलखो, लक्ष्मी नारायण मुंडा, दयामनी बारला, डॉ. रामचंद्र उरांव, अजय तिर्की, शिवा कच्छप और अनिल उरांव शामिल थे।

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