रांची | 31 अक्टूबर 2026 | Bharat Superfast News
झारखंड हाईकोर्ट ने विज्ञापन संख्या 21/2016 के तहत नियुक्त 34 प्रशिक्षित स्नातक शिक्षकों (TGT) को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने शंकर नायक एवं अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए इन शिक्षकों को फरवरी 2019 से काल्पनिक (Notional) नियुक्ति तिथि देने का आदेश दिया है।
अदालत के फैसले के अनुसार, संबंधित शिक्षकों को वरिष्ठता, वेतन वृद्धि, उन्नत वेतनमान और काल्पनिक आधार पर वेतन निर्धारण सहित अन्य परिणामी लाभ मिलेंगे। हालांकि, उन्हें पिछली अवधि का बकाया वेतन (Back Wages) नहीं दिया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) ने वर्ष 2016 में प्रशिक्षित स्नातक शिक्षकों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन संख्या 21/2016 जारी किया था। इस भर्ती में अनुसूचित जिलों के लिए 100 प्रतिशत स्थानीय आरक्षण का प्रावधान किया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने गुमला, लोहरदगा और रांची जिलों से आवेदन किया था और मुख्य परीक्षा में शामिल हुए थे। इसी बीच सोनी कुमारी बनाम झारखंड राज्य मामले में हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने 21 सितंबर 2020 को 100 प्रतिशत आरक्षण से संबंधित अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सत्यजीत कुमार बनाम झारखंड राज्य मामले में वर्ष 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने नई भर्ती कराने के निर्देश को रद्द करते हुए उसी विज्ञापन के तहत पूरे राज्य की संशोधित मेरिट सूची तैयार करने का आदेश दिया।
2023 में हुई नियुक्ति, जबकि अन्य अभ्यर्थी 2019 से कार्यरत थे
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद संशोधित चयन प्रक्रिया के तहत याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति लातेहार के जिला शिक्षा पदाधिकारी की ओर से मई, अगस्त और अक्टूबर 2023 में की गई।
वहीं, इसी विज्ञापन के तहत चयनित लातेहार जिले के अन्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति 9 फरवरी 2019 को ही हो चुकी थी। इसी अंतर को लेकर 34 शिक्षकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फरवरी 2019 से काल्पनिक नियुक्ति तिथि तथा उससे जुड़े लाभ देने की मांग की।
शिक्षकों की ओर से क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने अदालत में दलील दी कि नियुक्ति में हुई देरी के लिए शिक्षक जिम्मेदार नहीं थे। यह देरी न्यायिक प्रक्रिया और मुकदमेबाजी के कारण हुई थी।
उन्होंने 10 जुलाई 2026 को अजय कुमार बनाम झारखंड राज्य मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया। अधिवक्ता के अनुसार, मौजूदा मामला उस फैसले से पूरी तरह प्रभावित है और समान परिस्थिति वाले शिक्षकों को समान लाभ मिलना चाहिए।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पात्र शिक्षकों को लाभ से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत समानता और अधिकारों से जुड़े प्रावधानों के विपरीत होगा।
सरकार ने नियुक्ति पर नहीं जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने न तो शिक्षकों की नियुक्ति पर और न ही अजय कुमार मामले में दिए गए फैसले के लागू होने पर आपत्ति जताई। हालांकि, सरकार की ओर से कहा गया कि प्रत्येक याचिकाकर्ता के दावे की संबंधित अधिकारियों द्वारा रिकॉर्ड के आधार पर जांच की जानी चाहिए।
कोर्ट ने दिया समानता और न्याय का हवाला
अदालत ने माना कि नियुक्ति में देरी के लिए याचिकाकर्ता जिम्मेदार नहीं थे। एक ही चयन प्रक्रिया के तहत चुने गए अभ्यर्थियों को केवल न्यायिक प्रक्रिया के कारण वरिष्ठता में नुकसान नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने लैटिन कानूनी सिद्धांत Actus Curiae Neminem Gravabit का उल्लेख किया। इसका अर्थ है कि अदालत के किसी कार्य या प्रक्रिया के कारण किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं होना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि समान परिस्थिति वाले लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को उचित लाभ से वंचित करना मनमाना होगा।
12 सप्ताह के भीतर पूरी करनी होगी प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को लातेहार जिले में 9 फरवरी 2019 को नियुक्त हुए अभ्यर्थियों की तिथि से काल्पनिक नियुक्ति तिथि का लाभ दिया जाए।
इसके तहत शिक्षकों को वरिष्ठता, वेतन वृद्धि, उन्नत वेतनमान और काल्पनिक आधार पर वेतन निर्धारण सहित सभी परिणामी लाभ मिलेंगे। हालांकि, पिछली अवधि का बकाया वेतन देय नहीं होगा।
अदालत ने आदेश की प्रति प्राप्त होने के 12 सप्ताह के भीतर संबंधित प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने शिक्षकों की याचिका स्वीकार कर ली।
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