नई दिल्ली, 11 अक्टूबर 2026: देश में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुके UPI पर संभावित शुल्क को लेकर नई बहस छिड़ गई है। IIT बॉम्बे के प्रोफेसर आशीष दास और भारतीय रिजर्व बैंक के मौद्रिक नीति विभाग की पूर्व प्रभारी सलाहकार प्रज्ञा दास की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि UPI की व्यवस्था को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के साथ आम उपभोक्ताओं के लिए रोजमर्रा के भुगतान मुफ्त रखे जाने चाहिए।
‘UPI at a Crossroads: Reintroducing the MDR-Impact Analysis and the Way Forward’ नाम की इस रिपोर्ट के मुताबिक, यदि प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होता है, तो UPI सेवा प्रदाताओं को सालाना लगभग 18,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिल सकता है। हालांकि, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि शुल्क का बोझ यदि सही तरीके से तय नहीं किया गया, तो इसका अप्रत्यक्ष असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है।
क्या है MDR और UPI शुल्क पर क्यों हो रही चर्चा?
MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की सुविधा के बदले व्यापारी से लिया जाता है। UPI शुल्क व्यवस्था को लेकर बहस का मुख्य सवाल यह है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली के संचालन और विस्तार की लागत कौन वहन करे।
रिपोर्ट के अगस्त 2026 के आंकड़ों पर आधारित अनुमान के मुताबिक, प्रस्तावित ढांचे से हर महीने करीब 1,500 करोड़ रुपये का MDR राजस्व मिल सकता है। रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि इस लागत का बड़ा हिस्सा बड़े कारोबारियों और ऑनलाइन कंपनियों से लिया जा सकता है, ताकि आम लोगों के रोजमर्रा के भुगतान पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
यह रिपोर्ट में दिया गया अनुमान और सुझाव है। इसे सभी UPI लेन-देन पर शुल्क लागू होने की आधिकारिक घोषणा नहीं माना जाना चाहिए।
आम ग्राहकों पर कैसे पड़ सकता है असर?
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि व्यापारियों से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए अतिरिक्त शुल्क लिया जाता है, तो वे इसकी भरपाई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ाकर कर सकते हैं। ऐसे में ग्राहकों से सीधे UPI अधिभार नहीं लेने के बावजूद उनका खर्च बढ़ सकता है।
इसका असर छोटे मूल्य की खरीदारी करने वाले लोगों पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट के लेखकों के अनुसार, यदि कारोबारी अपनी लागत को उत्पादों की कीमतों में शामिल करते हैं, तो UPI से भुगतान करने वाले ग्राहकों के साथ नकद भुगतान करने वाले ग्राहकों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
इसी कारण रिपोर्ट में रोजमर्रा की खरीदारी और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले भुगतान को मुफ्त बनाए रखने पर जोर दिया गया है।
50 करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर वाले कारोबारियों पर शुल्क का सुझाव
रिपोर्ट में प्रस्ताव दिया गया है कि सालाना 50 करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर वाले ऑनलाइन कारोबारियों और व्यवसायों को MDR व्यवस्था के दायरे में रखा जा सकता है। लेखकों का अनुमान है कि इस श्रेणी के कारोबारियों से मिलने वाले शुल्क से प्रस्तावित ढांचे के कुल राजस्व का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हो सकता है।
रिपोर्ट में डिजिटल भुगतान सुविधा शुल्क लगाने का सुझाव भी दिया गया है। इसके साथ ही, यदि शुल्क प्रतिशत के आधार पर तय किया जाता है, तो उसकी अधिकतम सीमा 40 रुपये रखने की सिफारिश की गई है।
लेखकों का तर्क है कि ऑनलाइन कारोबार के लिए डिजिटल भुगतान बेहद जरूरी है। इसलिए भुगतान प्रणाली के संचालन की लागत में बड़े कारोबारियों की अधिक भागीदारी होनी चाहिए।
बैंकों को भी योगदान देने की सिफारिश
रिपोर्ट में UPI व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए बैंकों की भूमिका पर भी चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि बैंकों को केवल व्यापारियों से मिलने वाले MDR राजस्व पर निर्भर रहने के बजाय डिजिटल भुगतान व्यवस्था के संचालन और सुधार में आर्थिक योगदान देना चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने कुल 4.31 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हिस्सा 1.98 लाख करोड़ रुपये बताया गया है।
लेखकों ने सुझाव दिया है कि बैंक UPI व्यवस्था के लिए करीब 15,000 करोड़ रुपये का योगदान दें। रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या 75,000 रुपये के UPI लेन-देन पर 300 रुपये का शुल्क उचित होगा। लेखकों के मुताबिक, किसी सेवा के लिए लिया जाने वाला शुल्क उसकी वास्तविक लागत के अनुरूप होना चाहिए।
UPI शुल्क तय करने में RBI की भूमिका पर जोर
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि UPI शुल्क का ढांचा तय करने में केवल नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) पर निर्भर रहने के बजाय भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को भी केंद्रीय भूमिका निभानी चाहिए।
लेखकों का मानना है कि UPI को आवश्यक बैंकिंग सेवा के रूप में देखते हुए ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिसमें बैंक, भुगतान ऐप और अन्य सेवा प्रदाताओं को उनकी भूमिका के अनुसार उचित मुआवजा मिले। साथ ही आम उपभोक्ताओं को डिजिटल भुगतान के लाभ से वंचित न होना पड़े।
रिपोर्ट में कर्ज की किस्त चुकाने और ऋण वसूली से जुड़े भुगतानों को MDR के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश भी की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कर्ज चुकाने के लिए डिजिटल माध्यम अपनाने वाले लोगों की लागत न बढ़े।
इसके अतिरिक्त, रिपोर्ट में क्रेडिट कार्ड से जुड़े शुल्कों की समीक्षा और उन क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान ढांचे को सहायता देने की बात कही गई है, जहां बैंकिंग और डिजिटल सेवाओं की पहुंच सीमित है।
नोटों की छपाई पर भी होता है बड़ा खर्च
रिपोर्ट में नकदी के इस्तेमाल से जुड़ी लागत का भी उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक, RBI ने पिछले पांच वित्तीय वर्षों में नोटों की छपाई पर 26,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं।
रिपोर्ट के लेखक आशीष दास का तर्क है कि डिजिटल भुगतान की आर्थिक व्यवहार्यता पर चर्चा करते समय नकदी व्यवस्था को बनाए रखने की लागत को भी ध्यान में रखना चाहिए। उनके अनुसार, UPI जैसे डिजिटल भुगतान माध्यमों के दीर्घकालिक आर्थिक लाभों को भी नीति निर्धारण में महत्व दिया जाना चाहिए।
आम लोगों के लिए क्या है इसका मतलब?
रिपोर्ट का मुख्य संदेश यह है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सेवा प्रदाताओं को उचित भुगतान मिलना चाहिए, लेकिन इसकी लागत सीधे आम उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जानी चाहिए।
हालांकि, रिपोर्ट में दिए गए सुझाव अपने आप में लागू नियम नहीं हैं। UPI पर शुल्क की वास्तविक व्यवस्था के लिए संबंधित नियामक और संस्थाओं की आधिकारिक अधिसूचनाओं को देखना जरूरी होगा।
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