भारत के फिज़िकल रिसर्च लैबोरटरी (Physical Research Laboratory) यानी PRL के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है, जो अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में काफी अहम मानी जा रही है. आज से करीब 44 साल पहले अंटार्कटिका में मिले एक उल्कापिंड को अब चंद्रयान-3 की लैंडिंग साइट से जोड़ा गया है. यह खोज NPJ Space Exploration नाम की रिसर्च जर्नल में छपी है और इसे लिखने वाले वैज्ञानिकों में PRL के डायरेक्टर अनिल भारद्वाज भी शामिल हैं. आइए हम आपको इसके बारे में कुछ खास बातें बताते हैं.
यह उल्कापिंड ALHA 81005 के नाम से जाना जाता है, जिसे 1981 में अंटार्कटिका के Allan Hills इलाके से खोजा गया था. यह चांद से आया पहला ऐसा पत्थर माना जाता है, जिसे वैज्ञानिक तरीके से साबित किया गया था. अब PRL की नई रिसर्च कहती है कि इस उल्कापिंड की रासायनिक बनावट चंद्रयान-3 की लैंडिंग साइट शिव शक्ति स्टेशन से काफी मिलती-जुलती है.
चंद्रयान-3 के APXS से मिला अहम डेटा
प्रज्ञान रोवर पर लगा एक खास यंत्र, जिसका नाम APXS है, ने चांद की लैंडिंग वाली जगह पर मिट्टी की जांच की. इससे पता चला कि वहां मैग्नीशियम काफी ज्यादा मात्रा में है. यह Mg# 70 मापा गया, जो चांद के हाइलैंड इलाकों (Feldspathic Highland Terrane) के औसत स्तर से ज्यादा है. गौर करें कि Feldspathic Highland Terrane चांद की सतह का सबसे बड़ा इलाका है (लगभग 65% क्षेत्रफल), जो मुख्य रूप से सफेद-रंग की Anorthosite नाम के चट्टानों से बना है. यह इलाका ज्यादातर चांद के उस हिस्से पर है जो पृथ्वी से नहीं दिखता.
रिसर्च टीम ने चांद के 66 अलग-अलग उल्कापिंडों के डेटा से तुलना की, जो ओमान, लीबिया, अफ्रीका और अंटार्कटिका जैसी जगहों से मिले थे. इन सबमें ALHA 81005 की बनावट सबसे ज्यादा चंद्रयान-3 की साइट से मिलती-जुलती पाई गई. एल्यूमिनियम, आयरन और मैग्नीशियम की मात्रा दोनों जगह लगभग एक जैसी है.
चांद के इतिहास को समझने में मिलेगी मदद
इस रिसर्च का महत्व सिर्फ उल्कापिंड की पहचान तक ही सीमित नहीं है. वैज्ञानिका का कहना है कि चंद्रयान-3 की लैंडिंग साइट पर जो चीज मिली, वो चांद की निजली परत और ऊपरी मेंटल से आई हो सकती है. यह सब शायद अरबों साल पहले चांद पर हुई बहुत बड़ी-बड़ी टक्करों की वजह से हुआ. इनमें सबसे बड़ी टक्कर South Pole-Aitken basin नाम की जगह बनाने वाली थी.
PRL डायरेक्टर अनिल भारद्वाज का कहना है कि यह खोज चांद की भूगर्भीय समझ को और गहरा करती है. यह भारत के चंद्र मिशन और दशकों पुराने अंटार्कटिका उल्कापिंड कलेक्शन, दोनों की वैज्ञानिक अहमियत को एक साथ मजबूत करती है.


