रांची | 31 अक्टूबर 2026 | Bharat Superfast News
Jharkhand MMDR Act News: खनिजयुक्त भूमि पर उपकर (सेस) लगाने के राज्यों के अधिकार को सीमित करने वाले केंद्र सरकार के MMDR संशोधन अधिनियम, 2026 को लेकर झारखंड में राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली राज्य सरकार इस कानून के प्रभावों पर विधानसभा में चर्चा करने के साथ कानूनी विकल्पों पर भी विचार कर रही है। इसी क्रम में 25 और 26 नवंबर को विधानसभा का दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाने का निर्णय लिया गया है।
राज्य सरकार ने इसके साथ ही झारखंड खनिजयुक्त भूमि उपकर अधिनियम, 2024 की अनुसूची में संशोधन को भी मंजूरी दी है। हालांकि, इस संशोधन का वास्तविक प्रभाव केंद्रीय कानून के प्रावधानों और आगे की कानूनी स्थिति पर निर्भर करेगा।
क्या है MMDR संशोधन अधिनियम का विवाद?
केंद्र सरकार के खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 में नई धारा 9D जोड़ी गई है। इसके तहत खनिज अधिकारों और खनिजयुक्त भूमि पर राज्य सरकारों की ओर से कर, सेस या अन्य उपकर लगाने पर सीमाएं निर्धारित की गई हैं। ऐसे उपकर केंद्र सरकार की ओर से तय शर्तों और प्रतिबंधों के अनुसार ही लगाए जा सकेंगे।
कानून में पहले से लगाए गए कुछ ऐसे उपकरों और बकाया मांगों को भी अमान्य मानने का प्रावधान है, जो संशोधन लागू होने से पहले राज्य के पास जमा या वसूल नहीं किए गए थे। हालांकि, पहले से जमा या वसूल की गई राशि वापस करने का प्रावधान नहीं रखा गया है।
झारखंड सरकार का मानना है कि इन बदलावों से राज्य के खनिज राजस्व पर बड़ा असर पड़ सकता है।
विधानसभा का विशेष सत्र 25 और 26 नवंबर को
राज्य मंत्रिपरिषद ने 27 अक्टूबर की बैठक में विधानसभा का दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। सत्र के दौरान MMDR संशोधन अधिनियम और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) सहित महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा था कि मौजूदा परिस्थितियों में इन विषयों पर विधानसभा में विस्तार से चर्चा करना जरूरी है।
सरकार की ओर से इस मुद्दे पर सदन में चर्चा और आगे की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है।
खनिज उपकर कानून की अनुसूची में भी बदलाव
केंद्र के संशोधन के विरोध के साथ राज्य सरकार ने झारखंड खनिजयुक्त भूमि उपकर अधिनियम, 2024 की अनुसूची में संशोधन को भी मंजूरी दी है। इस कदम का उद्देश्य राज्य के मौजूदा कानूनी ढांचे में बदलाव करना है।
हालांकि, केंद्रीय MMDR कानून की नई धारा 9D के लागू रहने की स्थिति में राज्य की ओर से किए गए किसी भी बदलाव की वैधता और प्रभाव का आकलन संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही होगा।
इसलिए अनुसूची में संशोधन को सेस वसूली का निश्चित समाधान मानना अभी उचित नहीं होगा।
खनिज राजस्व को लेकर राज्य सरकार की चिंता
झारखंड खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों में शामिल है। राज्य के राजस्व में खनन क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। उपलब्ध बजट आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2026-27 में खनिजयुक्त भूमि उपकर से 14,656 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया है।
राज्य सरकार का आकलन है कि केंद्रीय संशोधन से उसे सालाना लगभग 14,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है। वहीं, आईआईएम रांची के विशेषज्ञ अमरेंदु नंदी का अनुमान है कि वास्तविक वार्षिक असर 6,500 से 8,500 करोड़ रुपये के बीच हो सकता है।
ये अलग-अलग आकलन हैं। वास्तविक वित्तीय प्रभाव कानून के क्रियान्वयन और संबंधित राजस्व आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट होगा।
केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों को लेकर मतभेद
राज्य सरकार इस संशोधन को राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और खनिज संसाधनों से जुड़े अधिकारों के नजरिये से देख रही है। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं का कहना है कि केंद्रीय कानून का उद्देश्य खनन क्षेत्र में एक समान व्यवस्था बनाना और निवेश को प्रोत्साहित करना है।
इस तरह विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि खनिजयुक्त भूमि पर उपकर लगाने के अधिकार और उससे होने वाले राजस्व पर राज्यों तथा केंद्र के बीच अधिकारों की सीमा क्या होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौती की तैयारी
झारखंड सरकार पहले ही MMDR संशोधन अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की संभावना पर विचार कर चुकी है। इस विवाद का एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ का फैसला भी है, जिसमें राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता को मान्यता दी गई थी।
अब नए केंद्रीय संशोधन और पहले के न्यायिक फैसले के बीच कानूनी स्थिति क्या होगी, इसका निर्धारण अदालत की सुनवाई और संबंधित प्रावधानों की व्याख्या से होगा।
नवंबर के विशेष सत्र पर टिकी निगाहें
25 और 26 नवंबर को होने वाला विधानसभा का विशेष सत्र इस विवाद में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। सदन में चर्चा के बाद राज्य सरकार आगे की रणनीति तय कर सकती है। इसमें केंद्र को प्रस्ताव भेजने और कानूनी विकल्पों पर आगे बढ़ने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।
फिलहाल, खनिज उपकर को लेकर केंद्र और झारखंड सरकार के बीच मतभेद जारी हैं। इस विवाद का अंतिम असर राज्य के राजस्व और खनन क्षेत्र पर किस तरह पड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
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