Ranchi News, 6 November 2026: झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड सामान्य स्नातक योग्यताधारी संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा (JGGLCCE-2023) के तहत हुई नियुक्तियों को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया है। जस्टिस दीपक रंजन की अदालत ने 18 अगस्त 2026 को जारी सरकारी अधिसूचना को विज्ञापन संख्या 10/2023 के तहत हुई भर्ती के मामले में रद्द कर दिया। इस फैसले से करीब 1932 नियुक्त कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित अभ्यर्थियों को सेवा में निरंतरता के साथ कार्यरत माना जाएगा। उन्हें वेतन और अन्य सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकेगा। हालांकि, परीक्षा में कथित गड़बड़ी से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच जारी रहेगी। जांच में किसी अभ्यर्थी की संलिप्तता प्रमाणित होने पर उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकेगी।
जनवरी 2026 में मिला था नियुक्ति पत्र
JSSC की ओर से आयोजित परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को जनवरी 2026 में नियुक्ति पत्र दिया गया था। इसके बाद वे राज्य के विभिन्न विभागों में काम कर रहे थे। सरकार ने 18 अगस्त 2026 को 22 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने की अधिसूचना जारी की थी। इसमें JGGLCCE-2023 की भर्ती भी शामिल थी।
सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए नियुक्त अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चयन प्रक्रिया पूरी होने और नियुक्तियां दिए जाने के बाद बिना ठोस साक्ष्य तथा संबंधित कर्मचारियों को सुनवाई का अवसर दिए सामूहिक रूप से भर्ती रद्द करना उचित नहीं है।
पेपर लीक के आरोप के बाद दोबारा हुई थी परीक्षा
JSSC ने विज्ञापन संख्या 10/2023 के तहत सहायक प्रशाखा पदाधिकारी, कनीय सचिवालय सहायक, श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी, प्रखंड कल्याण पदाधिकारी, प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी, योजना सहायक और अंचल निरीक्षक सह कानूनगो सहित विभिन्न पदों पर नियुक्ति के लिए परीक्षा आयोजित की थी।
परीक्षा 28 जनवरी और 4 फरवरी 2024 को प्रस्तावित थी। पेपर लीक की शिकायतों के बाद इसे रद्द कर दिया गया और 21 व 22 सितंबर 2024 को दोबारा परीक्षा आयोजित की गई।
पुनर्परीक्षा के बाद भी गड़बड़ी के आरोप लगे। इसके बाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका के साथ 1011 असफल अभ्यर्थियों की ओर से भी याचिकाएं दायर की गईं।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पहले भी हुई थी सुनवाई
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 3 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाते हुए परिणाम जारी करने और सफल अभ्यर्थियों को नियुक्त करने का निर्देश दिया था। साथ ही एसआईटी को छह महीने के भीतर जांच पूरी करने को कहा गया था।
अदालत ने 28 संदिग्ध अभ्यर्थियों में से दस्तावेज सत्यापन के लिए बुलाए गए 10 अभ्यर्थियों का परिणाम जांच पूरी होने तक रोकने का निर्देश भी दिया था। इसके बाद 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। हालांकि, नियुक्तियों को आपराधिक मामलों के अंतिम परिणाम के अधीन रखा गया था।
सरकार ने जांच में गड़बड़ी के संकेत मिलने की दी थी दलील
भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर जुलाई 2026 में हुए विरोध-प्रदर्शनों के बाद राज्य सरकार ने 18 अगस्त को 22 परीक्षाओं को रद्द करने की अधिसूचना जारी की थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि सीआईडी जांच में संगठित गड़बड़ी, ओएमआर शीट में छेड़छाड़, डिजिटल रिकॉर्ड में हेरफेर और कुछ अधिकारियों की संलिप्तता के संकेत मिले हैं। सरकार का कहना था कि ऐसे में गड़बड़ी से लाभ लेने वाले और ईमानदार अभ्यर्थियों को अलग करना मुश्किल है।
वहीं, याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि जांच पूरी होने और ठोस साक्ष्य सामने आने से पहले पूरी भर्ती रद्द करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि नियुक्त कर्मचारियों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
ठोस साक्ष्य के बिना पूरी भर्ती रद्द करना उचित नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकार की ओर से पेश जांच सामग्री से पूरी परीक्षा में व्यापक और व्यवस्थित गड़बड़ी साबित नहीं होती। जांच अभी पूरी नहीं हुई है और अंतिम रिपोर्ट भी प्रस्तुत नहीं की गई है।
अदालत के अनुसार, केवल आपराधिक जांच लंबित रहने के आधार पर पूरी चयन प्रक्रिया रद्द नहीं की जा सकती। सामूहिक रूप से नियुक्तियां समाप्त करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। साथ ही, सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना भी आवश्यक है।
एसआईटी जांच जारी रहेगी, दोषी पाए जाने पर कार्रवाई
हाईकोर्ट ने साफ किया कि भर्ती रद्द करने की अधिसूचना निरस्त होने का अर्थ यह नहीं है कि परीक्षा में गड़बड़ी के आरोप समाप्त हो गए हैं। एसआईटी को जांच तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने और जल्द पूरा करने का निर्देश दिया गया है।
नियुक्त कर्मचारियों को भी जांच में सहयोग करना होगा। यदि जांच में किसी अभ्यर्थी की संलिप्तता सामने आती है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकेगी।
इस फैसले से एक ओर नियुक्त कर्मचारियों की सेवा और वेतन संबंधी लाभ सुरक्षित हुए हैं, वहीं दूसरी ओर परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच जारी रखने का रास्ता भी खुला है।
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