Saturday, November 7, 2026

दीपावली पर बेटियों की घरौंदा पूजा का खास महत्व, अन्न-धन और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी है परंपरा

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Hazaribagh News, 7 November 2026: दीपावली का पर्व रोशनी, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में इस अवसर पर घरौंदा पूजा की विशेष लोकपरंपरा भी निभाई जाती है। दीपावली की रात घर की बेटियां सजाए गए घरौंदे की पूजा करती हैं और मां लक्ष्मी से परिवार में सुख-समृद्धि तथा धन-धान्य बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं।

मिट्टी से लेकर लकड़ी तक, बदल रहा घरौंदे का स्वरूप

घरौंदा बनाने की तैयारी कई घरों में दीपावली से करीब एक महीने पहले ही शुरू हो जाती है। पारंपरिक रूप से मिट्टी, ईंट और गत्ते की मदद से दो मंजिला या बहुमंजिला घरौंदे बनाए जाते हैं। इसके बाद इन्हें रंगों और आकर्षक रोशनी से सजाया जाता है।

समय के साथ घरौंदों का स्वरूप भी बदला है। अब बाजार में लकड़ी, प्लास्टिक और गत्ते से बने तैयार घरौंदे उपलब्ध हैं। लोग अपनी पसंद के अनुसार इन्हें खरीदकर घर लाते हैं और दीपावली की रात पूजा करते हैं।

कुल्हिया-चुकर में भरे जाते हैं पांच तरह के अनाज

घरौंदा पूजा में मिट्टी के छोटे बर्तनों का विशेष महत्व होता है। इन्हें स्थानीय तौर पर कुल्हिया-चुकर कहा जाता है। पूजा के दौरान इन बर्तनों में पांच प्रकार के अनाज भरकर घरौंदे के भीतर रखा जाता है।

यह परंपरा अन्न, धन और परिवार की खुशहाली से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि जिस तरह घरौंदा अनाज से भरा रहता है, उसी तरह परिवार का जीवन भी सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहे।

अन्नकोष परंपरा से जुड़ा है घरौंदा: महंत विद्यानंद दास

हजारीबाग बड़ा अखाड़ा के महंत विद्यानंद दास के अनुसार, घरौंदा पूजा मूल रूप से अन्नकोष पद्धति से जुड़ी परंपरा है। पुराने समय में घरों में सालभर के अनाज को सुरक्षित रखने के लिए बड़ी-बड़ी कोठियां बनाई जाती थीं। इन्हीं अनाज भंडारों का प्रतीकात्मक रूप आज घरौंदे में दिखाई देता है।

घरौंदे को परिवार में धन-धान्य, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मुख्य लक्ष्मी पूजा के बाद घर की बेटियां इसकी पूजा करती हैं।

हजारीबाग के बाजारों में सजे कुल्हिया-चुकर

दीपावली को लेकर हजारीबाग के चौक-चौराहों और बाजारों में घरौंदा सजाने के लिए मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों की बिक्री हो रही है। दुकानदार इन्हें आकर्षक रंगों से सजाकर टोकरियों में रखकर बेच रहे हैं। बाजार में इनकी कीमत करीब 50 से 60 रुपये तक बताई जा रही है।

एक स्थानीय महिला के अनुसार, इन बर्तनों में पांच तरह के अनाज भरने की परंपरा परिवार की समृद्धि की कामना से जुड़ी है। इसके जरिए बेटियां अपने मायके और ससुराल, दोनों जगह सुख-समृद्धि और खुशहाली की प्रार्थना करती हैं।

घरौंदा पूजा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि अन्न के महत्व, पारिवारिक खुशहाली और पीढ़ियों से चली आ रही लोकसंस्कृति का प्रतीक भी है।

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