Sunday, September 20, 2026

Jharkhand High Court: बिना मान्यता PG कोर्स में दाखिला पड़ा भारी, MGM को छात्र को 46.94 लाख रुपये देने का आदेश.

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रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (MGM) में बिना मान्यता वाले पीजी डिप्लोमा कोर्स में दाखिले से जुड़े मामले में कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने कॉलेज को छात्र से लिए गए बांड और स्टाइपेंड की राशि लौटाने के साथ मानसिक परेशानी तथा करियर के दो महत्वपूर्ण वर्ष प्रभावित होने के एवज में मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

अदालत के आदेश के अनुसार, कॉलेज को कुल 39,94,645 रुपये बांड और स्टाइपेंड के तौर पर जमा रकम के रूप में वापस करने होंगे। इसके अतिरिक्त छात्र को 7 लाख रुपये मुआवजा भी देना होगा। इस तरह कुल राशि करीब 46.95 लाख रुपये होती है।

2019-21 सत्र में हुआ था दाखिला

मामला वर्ष 2019-21 सत्र के डिप्लोमा इन मेडिकल रेडियो डायग्नोसिस (DMRD-रेडियोलॉजी) पाठ्यक्रम से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, इलाहाबाद से MBBS की पढ़ाई की थी और 2019 में NEET-PG परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

काउंसलिंग के बाद उसे MGM जमशेदपुर में DMRD-रेडियोलॉजी की सीट मिली। उसने पहले मिली सीट छोड़कर MGM में दाखिला ले लिया। प्रवेश के समय कॉलेज ने उससे एक बांड पर हस्ताक्षर कराए थे।

बांड में पढ़ाई बीच में छोड़ने पर 30 लाख रुपये देने और प्राप्त स्टाइपेंड वापस करने की शर्त रखी गई थी। कॉलेज ने उसके मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र भी अपने पास रख लिए थे।

बाद में पता चला, पाठ्यक्रम को मान्यता नहीं थी

याचिकाकर्ता का कहना था कि कॉलेज पहुंचने के बाद उसे रेडियोलॉजी विभाग में पर्याप्त शिक्षकों और प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं होने की जानकारी मिली। इसके बाद उसे पता चला कि जिस DMRD पाठ्यक्रम में उसने दाखिला लिया था, उसे तत्कालीन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) से मान्यता प्राप्त नहीं थी।

बाद में उसने INI-CET परीक्षा दी और चयनित होने के बाद MGM से अपने मूल दस्तावेज मांगे। दस्तावेज वापस नहीं मिलने के कारण वह नए संस्थान में समय पर दाखिला नहीं ले सका।

इसके बाद उसने 2021 में दोबारा NEET-PG परीक्षा दी। इस परीक्षा में उसकी ऑल इंडिया रैंक 270 रही और उसे संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, लखनऊ में प्रवेश मिला।

रेडियोलॉजी विभाग की सुविधाओं पर भी कोर्ट नाराज

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने MGM में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं को लेकर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत के सामने यह बात आई कि रेडियोलॉजी से संबंधित पीजी डिप्लोमा संचालित करने वाले संस्थान में MRI मशीन उपलब्ध नहीं थी।

इसके अलावा वहां मौजूद CT स्कैन मशीन के भी काम नहीं करने की बात सामने आई। कोर्ट ने माना कि किसी पीजी पाठ्यक्रम के लिए आवश्यक संसाधनों और सुविधाओं की वास्तविक स्थिति छात्रों से छिपाना गंभीर विषय है।

बांड को लेकर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी छात्र को ऐसे पाठ्यक्रम में दाखिला दिया गया जिसकी मान्यता ही नहीं थी, तो उस आधार पर लिया गया बांड भी प्रभावी नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि गलत या भ्रामक आधार पर कराया गया प्रवेश छात्र के लिए गंभीर नुकसान का कारण बन सकता है। इसी आधार पर MGM को बांड और स्टाइपेंड की रकम लौटाने तथा छात्र को अलग से मुआवजा देने का आदेश दिया गया।

MCI और काउंसलिंग व्यवस्था पर भी सवाल

हाई कोर्ट ने तत्कालीन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि जब संबंधित पाठ्यक्रम को मान्यता नहीं मिली थी, तो नियामक संस्था की ओर से कॉलेज के खिलाफ समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

काउंसलिंग प्रक्रिया पर भी कोर्ट ने सवाल उठाया। अदालत ने जानना चाहा कि यदि पाठ्यक्रम मान्य नहीं था, तो काउंसलिंग के दौरान उस संस्थान और पाठ्यक्रम को उम्मीदवार के लिए कैसे उपलब्ध कराया गया।

फैसले में अदालत ने छात्र के आर्थिक नुकसान के साथ उसके करियर पर पड़े प्रभाव और मानसिक परेशानी को भी गंभीरता से लिया।

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