Thursday, August 13, 2026

IIT ISM धनबाद के शोध से खनन क्षेत्र में नई उम्मीद, फ्लाई ऐश और प्लास्टिक से बना बैकफिलिंग मटेरियल.

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धनबाद: प्राकृतिक बालू पर खदानों की बैकफिलिंग के लिए बढ़ती निर्भरता के बीच IIT (ISM) धनबाद के शोधकर्ताओं ने कचरे से एक वैकल्पिक मटेरियल विकसित किया है। माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग की टीम ने फ्लाई ऐश और प्लास्टिक कचरे को मिलाकर ऐसा पदार्थ तैयार किया है, जिसका इस्तेमाल भूमिगत खदानों में खाली स्थान भरने के लिए किया जा सकता है।

इस शोध का नेतृत्व माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख प्रो. भंवर सिंह चौधरी ने किया। परियोजना में पोलैंड के विशेषज्ञों ने भी सहयोग किया है।

FPA नाम दिया गया नया मटेरियल

शोधकर्ताओं ने तैयार सामग्री को Fly Ash-Plastic Aggregate (FPA) नाम दिया है। इसमें कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई ऐश और प्लास्टिक कचरे का उपयोग किया गया है।

इस तकनीक के जरिए एक साथ दो तरह के कचरे के उपयोग की संभावना तलाशने की कोशिश की गई है। फ्लाई ऐश के सुरक्षित निपटारे की चुनौती और प्लास्टिक कचरे से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को कम करने की दिशा में यह तकनीक उपयोगी हो सकती है।

80 फीसदी फ्लाई ऐश और 20 फीसदी प्लास्टिक

रिसर्च टीम के अनुसार FPA तैयार करने में 80 प्रतिशत फ्लाई ऐश और 20 प्रतिशत हाई-डेंसिटी पॉलीएथिलीन (HDPE) प्लास्टिक वेस्ट का इस्तेमाल किया गया। दोनों सामग्रियों को थर्मल प्रक्रिया के माध्यम से मिलाकर नया एग्रीगेट तैयार किया गया।

यह शोध कोयला मंत्रालय से वित्त पोषित परियोजना के तहत किया गया। इसमें प्रो. चौधरी के साथ रिसर्च स्कॉलर डॉ. मुनिपाला मनोहर ने भी काम किया।

प्राकृतिक बालू का विकल्प बनने की संभावना

भूमिगत खनन के बाद जमीन के अंदर खाली जगह बन जाती है। इन स्थानों को भरकर भूमिगत संरचना को स्थिर रखने के लिए बैकफिलिंग की जाती है। पारंपरिक तौर पर इसके लिए प्राकृतिक बालू का इस्तेमाल किया जाता रहा है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि FPA भविष्य में इस क्षेत्र में वैकल्पिक सामग्री के रूप में इस्तेमाल हो सकता है। खासकर प्राकृतिक सैंड की उपलब्धता और बढ़ती मांग को देखते हुए इसके उपयोग की संभावनाएं महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

वजन कम और मजबूती के अच्छे संकेत

प्रयोगशाला परीक्षणों में FPA ने बैकफिलिंग के लिहाज से कई उपयोगी गुण दिखाए। शोध के मुताबिक यह सामग्री मजबूत और टिकाऊ होने के साथ पानी के निकास में भी सहायक है।

प्राकृतिक बालू की तुलना में इसका वजन कम होने के कारण इसे स्लरी पाइपलाइन के माध्यम से भूमिगत क्षेत्रों तक पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसके कणों की सतह खुरदरी और कोणीय पाई गई, जिससे वे एक-दूसरे के साथ बेहतर तरीके से जुड़ सकते हैं।

दबाव से जुड़े परीक्षणों में भी FPA ने अच्छा प्रतिरोध दिखाया। इससे संकेत मिलता है कि बैकफिलिंग के बाद भूमिगत क्षेत्र की स्थिरता बनाए रखने में यह सामग्री उपयोगी हो सकती है।

माइन सेफ्टी में भी मिल सकता है फायदा

शोधकर्ताओं के अनुसार FPA का इस्तेमाल भविष्य में हाइड्रोलिक स्टोइंग जैसी तकनीकों में किया जा सकता है। इसमें तैयार सामग्री को पंप के माध्यम से भूमिगत खाली हिस्सों तक पहुंचाकर भरा जाता है।

ऐसा करने से खाली भूमिगत क्षेत्रों को सहारा देने और खदान की संरचनात्मक स्थिरता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले इसके प्रदर्शन और सुरक्षा का विस्तृत मूल्यांकन जरूरी होगा।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने किया सहयोग

इस परियोजना में पोलैंड के कई विशेषज्ञों का सहयोग रहा। इनमें डॉ. क्रिजिस्तोफ स्क्रिप्कोव्स्की, डॉ. क्रिजिस्तोफ जागोर्स्की और डॉ. अन्ना जागोर्स्का शामिल हैं। उन्होंने क्रमशः संबंधित इंजीनियरिंग और भू-विज्ञान संस्थानों से इस शोध में योगदान दिया।

कचरे को संसाधन में बदलना लक्ष्य

प्रो. भंवर सिंह चौधरी के अनुसार शोध का प्रमुख उद्देश्य ऐसे अपशिष्ट पदार्थों को उपयोगी संसाधन में बदलना है, जिन्हें सामान्य तौर पर पर्यावरणीय चुनौती माना जाता है।

FPA तकनीक से एक ओर प्राकृतिक बालू की खपत घटाने की संभावना है, वहीं दूसरी ओर फ्लाई ऐश और प्लास्टिक कचरे के उपयोग का नया रास्ता खुल सकता है। यदि आगे के परीक्षणों में इसके परिणाम प्रभावी रहते हैं, तो यह तकनीक भूमिगत खनन और अपशिष्ट प्रबंधन दोनों क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है।

प्रो. भंवर सिंह चौधरी का शोध अनुभव

प्रो. चौधरी IIT (ISM) धनबाद के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े हैं और उनके शोध क्षेत्रों में माइन प्लानिंग, रॉक ब्लास्टिंग, टनलिंग तथा भूमिगत खनन तकनीक शामिल हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग के बाद माइन प्लानिंग में उच्च शिक्षा और IIT (BHU) वाराणसी से रॉक ब्लास्टिंग में पीएचडी की है। उनके नाम कई शोध प्रकाशन भी दर्ज हैं।

इस शोध की खास बात यह है कि खनन और ऊर्जा उद्योग से निकलने वाले दो प्रमुख अपशिष्ट—फ्लाई ऐश और प्लास्टिक—को संभावित रूप से खदानों की बैकफिलिंग में इस्तेमाल होने वाले संसाधन में बदलने की दिशा में प्रयास किया गया है।

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