Thursday, April 30, 2026

ICMR की एक बड़ी स्टडी के मुताबिक, भारत में 10.1 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से परेशान हैं.

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भारत में डायबिटीज एक गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम बन गई है. ICMR की एक बड़ी स्टडी के मुताबिक, भारत में 10.1 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से परेशान हैं और लगभग 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटिक स्टेज में हैं, जिससे यह एक ‘साइलेंट’ मेडिकल इमरजेंसी बन गई है. डायबिटीज शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित करता है, लेकिन आंखों पर इसका प्रभाव सबसे भयावह होता है क्योंकि आमतौर पर प्रारंभिक अवस्था में इसके कोई लक्षण नहीं दिखते है. इसे मेडिकल भाषा में डायबिटिक रेटिनोपैथी कहते हैं.

डायबिटिक रेटिनोपैथी, जो डायबिटीज के मरीजों में आंखों की रोशनी जाने का एक बड़ा कारण है, अक्सर शुरुआती स्टेज में कोई लक्षण नहीं दिखाता है. यह हाई ब्लड शुगर के कारण रेटिना की ब्लड वेसल को नुकसान पहुंचाता है. लक्षण तभी महसूस होते हैं जब स्थिति गंभीर हो जाती है और हमेशा के लिए आंखों की रोशनी चली जाती है.

बैंगलोर के नारायण आई हॉस्पिटल की सीनियर स्पेशलिस्ट डॉ. चैत्रा जयदेव का कहना है कि हमारी आंखों के पीछे एक लाइट-सेंसिंग लेयर होती है जिसे ‘रेटिना’ कहते हैं. जब शरीर में डायबिटीज होती है, तो यह धीरे-धीरे वहां मौजूद बहुत पतली ब्लड वेसल को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है. उनका कहना है कि इन ब्लड वेसल के कमजोर होने, सूजन या लीकेज से नजर धुंधली हो जाती है. दरअसल, जब ब्लड वेसल कमजोर होकर टूट जाती हैं, तो शरीर नई ब्लड वेसल बनाता है जो नाजुक होती हैं और उनमें ब्लीडिंग होने का खतरा रहता है. इस गंभीर स्थिति को प्रोलिफेरेटिव डायबिटिक रेटिनोपैथी कहा जाता है

इसके मुख्य लक्षण आमतौर पर पढ़ने में असमर्थता, चेहरे पहचानने में कठिनाई और नजर में अचानक काले धब्बे या तैरती हुई तस्वीरें हैं. हालांकि, छिपा हुआ खतरा यह है कि मरीज को कोई लक्षण महसूस होने से पहले ही नुकसान शुरू हो सकता है.

यह ‘साइलेंट किलर’ क्यों है?
डायबिटीज की वजह से होने वाली डायबिटिक रेटिनोपैथी को ‘साइलेंट किलर’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें शुरू में कोई दर्द या साफ लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. हालांकि, रेटिना के बाहरी हिस्सों को नुकसान बहुत पहले शुरू हो सकता है.

ऐसे में, डॉ. जयदेव का कहना है कि एक बार रेटिना खराब हो जाने के बाद उसे वापस उसकी असली हालत में लाना नामुमकिन है. उनका कहना है कि सही इलाज से ही नुकसान को बढ़ने से रोका जा सकता है और बची हुई नजर बचाई जा सकती है. इसलिए, इसका एकमात्र उपाय यह है कि जब आपकी नजर ठीक तो ठीक हो हो तभी जांच करवा लें.

सबसे ज्यादा प्रभावित कौन होता है?
डायबिटीज से पीड़ित हर व्यक्ति को आंखों की समस्याएं होने का खतरा रहता है. खास तौर पर, यह किसी भी तरह की डायबिटीज (जैसे टाइप 1, टाइप 2, या जेस्टेशनल डायबिटीज) में आंखों को प्रभावित कर सकती है. सबसे अहम बात यह है कि आपको डायबिटीज कितने समय से है.

यदि किसी व्यक्ति को 20 से 30 साल या उससे अधिक समय से डायबिटीज है, तो उन्हें रेटिना (आंख के पर्दे) को नुकसान पहुँचने (डायबिटिक रेटिनोपैथी) की बहुत ज्यादा संभावना होती है, चाहे उनका ब्लड शुगर कितना भी बेहतर नियंत्रित क्यों न हो. इसी तरह, जिन लोगों को बहुत कम उम्र में डायबिटीज हो जाती है, उन्हें रेटिना को नुकसान पहुंचने का खतरा काफी ज्यादा होता है, क्योंकि उन्हें इस बीमारी के साथ बहुत लंबे समय तक जीना पड़ता है.

अन्य और रिस्क फैक्टर
अगर आपको डायबिटीज के साथ-साथ दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम भी हैं, तो रेटिनल डैमेज और तेजी से बिगड़ सकता है. खास तौर पर, हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल वाले लोगों में रेटिनल ब्लड वेसल ज्यादा तेजी से कमजोर हो जाती हैं.

प्रेग्नेंसी भी एक नाजुक समय होता है. जेस्टेशनल डायबिटीज से पीड़ित महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान खास ध्यान रखना चाहिए क्योंकि रेटिनल डैमेज तेजी से हो सकता है. इसी तरह, गलत दवाएं लेना, खराब डाइट और एक्सरसाइज की कमी भी रेटिना को नुकसान पहुंचा सकती है.

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