नई दिल्ली: दुनिया की अर्थव्यवस्था ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां तेज आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ युद्ध, ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और तकनीकी बदलाव जैसी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। ऐसे माहौल में किसी देश की आर्थिक सफलता को केवल GDP की वृद्धि दर से आंकना पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। उसकी वास्तविक मजबूती इस बात से भी तय होती है कि वह अचानक आने वाले वैश्विक झटकों का कितनी प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है।
नई दिल्ली में आयोजित कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 के सत्र ‘A World Priced for Risk’ में अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों ने इसी मुद्दे पर चर्चा की। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को आर्थिक विकास के साथ अपनी रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करने और पर्यावरणीय जोखिमों को कम करने के बीच संतुलन कायम करना होगा।
आर्थिक मजबूती के लिए तीन क्षेत्रों पर ध्यान
विशेषज्ञों की चर्चा में तीन प्रमुख आयाम सामने आए—सुरक्षा, स्थिरता और वैश्विक जुड़ाव।
ऊर्जा, खाद्य और महत्वपूर्ण तकनीकों के मामले में घरेलू क्षमता मजबूत करना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ अंतरराष्ट्रीय बाजारों से दूरी बनाना नहीं है। वैश्विक व्यापार भारत को बाजार, तकनीक और निवेश के अवसर उपलब्ध कराता है। इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों में जोखिम कम करने के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लाभों को बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।
इसी तरह जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण का विषय मानने के बजाय आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा से जोड़कर देखने की जरूरत बताई गई।
निकोलस स्टर्न ने जलवायु जोखिम पर जताई चिंता
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर निकोलस स्टर्न ने भारत की जलवायु संबंधी संवेदनशीलता पर जोर दिया। उनके अनुसार चक्रवात, बाढ़, सूखा और मानसून में बदलाव जैसी घटनाएं कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डाल सकती हैं।
उन्होंने विकास और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग लक्ष्यों के रूप में देखने के बजाय दोनों पर एक साथ काम करने की जरूरत बताई। इसके लिए खराब हो चुकी भूमि का पुनर्वास, तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव का संरक्षण, सार्वजनिक परिवहन का विस्तार और ग्रामीण व छोटे शहरों में विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा जैसी पहलों को उपयोगी बताया गया।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत ने बढ़ाए आयात स्रोत
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी. के. मिश्रा ने बदलते वैश्विक माहौल में आर्थिक सुरक्षा की बढ़ती अहमियत पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि अनिश्चितता के बीच कंपनियां अपनी आपूर्ति के स्रोतों में विविधता ला रही हैं, अतिरिक्त भंडार रख रही हैं और निवेश संबंधी फैसलों में अधिक सावधानी बरत रही हैं। इसी तरह सरकारें भी व्यापार समझौतों और औद्योगिक नीतियों के जरिए जोखिम घटाने की कोशिश कर रही हैं।
ऊर्जा सुरक्षा का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भारत ने कच्चे तेल के आयात में स्रोत देशों की संख्या बढ़ाई है। उनके अनुसार पहले भारत करीब 27 देशों से कच्चा तेल खरीदता था, जबकि अब यह संख्या 43 देशों तक पहुंच गई है। इसका उद्देश्य किसी सीमित संख्या में आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता से जुड़े जोखिम को कम करना है।
हालांकि, मिश्रा ने यह भी रेखांकित किया कि आर्थिक सुरक्षा की अपनी लागत होती है। रणनीतिक भंडार रखना या कुछ महंगे घरेलू विकल्प विकसित करना अतिरिक्त खर्च बढ़ा सकता है। इसलिए हर संभावित जोखिम के लिए समान स्तर पर संसाधन लगाने के बजाय उन खतरों को प्राथमिकता देना जरूरी है जिनसे अर्थव्यवस्था या समाज को गंभीर नुकसान हो सकता है।
बढ़ता तापमान अर्थव्यवस्था के लिए भी चुनौती
शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन ने अत्यधिक गर्मी और बढ़ते तापमान के प्रभावों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का भार विकासशील देशों पर विशेष रूप से अधिक पड़ रहा है।
उनके अनुसार वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करने की प्रक्रिया में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होगा, ताकि जलवायु लक्ष्यों के साथ विकास की जरूरतों को भी संतुलित किया जा सके।
भारत के सामने दोहरी चुनौती
कॉन्क्लेव में हुई चर्चा का एक प्रमुख निष्कर्ष यह रहा कि ऊर्जा, खाद्य, तकनीक और पर्यावरण से जुड़े जोखिम अब अलग-अलग मुद्दे नहीं रह गए हैं। एक क्षेत्र में आया संकट दूसरे क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सकता है।
भारत के लिए चुनौती इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि देश तेज आर्थिक वृद्धि के दौर में है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8% GDP वृद्धि दर्ज की गई है। आगे की चुनौती इस वृद्धि की गति को बनाए रखने के साथ यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक प्रगति व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचे।
विशेषज्ञों की चर्चा से यह संकेत मिलता है कि भविष्य की आर्थिक रणनीति में वैश्विक बाजारों से जुड़ाव और घरेलू क्षमता निर्माण दोनों की भूमिका रहेगी। बाहरी दुनिया से संबंध बनाए रखते हुए ऊर्जा, खाद्य, तकनीक और जलवायु जोखिमों के प्रति देश की आंतरिक तैयारी मजबूत करना आर्थिक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
