नई दिल्ली: चीन का रियल एस्टेट बाजार, जो कभी उसकी आर्थिक ताकत का सबसे बड़ा इंजन था, आज इतिहास के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है. इस संकट ने वैश्विक बाजारों को सतर्क कर दिया है. क्या भारत भी अनजाने में उन्हीं गलतियों को दोहरा रहा है? भारतीय रियल एस्टेट के भीतर कौन से खतरे छिपे हैं? इन सभी गंभीर मुद्दों पर ‘ईटीवी भारत’ ने देश की प्रतिष्ठित रियल एस्टेट कंसल्टेंसी फर्म एनारॉक (ANAROCK) ग्रुप के वाइस चेयरमैन संतोष कुमार से विस्तृत बातचीत की.
सवाल: चीन में आए इतने गहरे और लंबे समय तक चलने वाले प्रॉपर्टी संकट के मुख्य संरचनात्मक कारण क्या थे?
संतोष कुमार: चीन का संकट कोई अस्थाई मंदी नहीं है. यह सरकारी नीतियों द्वारा प्रायोजित अत्यधिक निर्माण, एक दोषपूर्ण प्री-सेल मॉडल और महंगी भूमि नीलामियों का एक घातक मिश्रण था. वहां जमीन की कीमतें हर साल 17% की दर से बढ़ रही थीं, जबकि घरों के दाम केवल 9% बढ़ रहे थे. इस असंतुलन ने बिल्डर्स पर कर्ज का पहाड़ खड़ा कर दिया. इसके अलावा, चीन की स्थानीय सरकारें अपने राजस्व (Fiscal Revenue) के 40% हिस्से के लिए सीधे जमीन की बिक्री पर निर्भर थीं, जिसने बाजार में एक कृत्रिम तेजी बनाए रखी. अंत में, साल 2022 से शुरू हुई जनसांख्यिकीय गिरावट (घटती आबादी) ने इस पूरे सिस्टम को ध्वस्त कर दिया.
सवाल: चीन के विकास मॉडल में अत्यधिक कर्ज और रियल एस्टेट की कितनी बड़ी भूमिका थी?
संतोष कुमार: रियल एस्टेट और उससे जुड़े उद्योग चीन की जीडीपी में लगभग 25% से 29% तक का योगदान दे रहे थे. चीनी परिवारों ने अपनी कुल संपत्ति का लगभग 70% हिस्सा सिर्फ प्रॉपर्टी में निवेश कर रखा था. यह पूरा ढांचा अगस्त 2020 में तब ताश के पत्तों की तरह ढह गया, जब बीजिंग ने डेवलपर्स के कर्ज लेने पर ‘थ्री रेड लाइन्स’ नीति के तहत कड़े प्रतिबंध लगा दिए. इसके बाद डेवलपर्स, स्थानीय सरकारें और आम परिवार—सब एक साथ बिना किसी वित्तीय बफर के संकट में आ गए.
सवाल: चीन की सरकार लगातार प्रोत्साहन पैकेज दे रही है, फिर भी खरीदारों का भरोसा वापस क्यों नहीं लौट रहा है?
संतोष कुमार: समस्या यह है कि आप एक संरचनात्मक बीमारी का इलाज केवल वित्तीय मदद से नहीं कर सकते. चीन में इस समय 76.2 करोड़ वर्ग मीटर से अधिक बने-बनाए तैयार घर बिना बिके खाली पड़े हैं. एवग्रैंड जैसी दिग्गज कंपनियों के डिफॉल्ट होने के बाद खरीदारों का प्री-सेल मॉडल से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है. जब आबादी घट रही हो और लोगों की संपत्ति पहले से ही डूबते हुए एसेट्स में फंसी हो, तो कोई भी नया घर खरीदने का जोखिम नहीं लेना चाहता.
सवाल: क्या संकट से पहले के चीन और आज के भारतीय रियल एस्टेट बाजार में कोई समानताएं दिखती हैं?
संतोष कुमार: हां, कुछ बाहरी लक्षण बिल्कुल समान हैं. जैसे—प्रमुख शहरों में कीमतों का तेजी से बढ़ना, कुछ बड़े और चुनिंदा डेवलपर्स के हाथों में बाजार का केंद्रित होना और सट्टा लगाने वाले निवेशकों की बढ़ती भागीदारी. लेकिन भारत में चीन जैसी बुनियादी कमजोरियां नहीं हैं. हमारे यहां चीन जैसा आक्रामक प्री-सेल प्री-पेमेंट सिस्टम नहीं है, जमीनें निजी हाथों में हैं और स्थानीय सरकारों का बजट जमीन बेचने पर निर्भर नहीं है. हालांकि, चीन से भारत के लिए सबसे बड़ी चेतावनी ‘किफायती घरों का लुप्त होना’ है. भारत में किफायती आवास की हिस्सेदारी 2021 के 37% से गिरकर 2025 की पहली छमाही में मात्र 18% रह गई है.
सवाल: क्या भारत का हाउसिंग मार्केट इस समय ‘ओवरहीट’ (ज़रूरत से ज़्यादा महंगा) हो चुका है?
संतोष कुमार: पूरा भारत नहीं, लेकिन कुछ खास शहरों के चुनिंदा माइक्रो-मार्केट्स निश्चित रूप से ओवरहीटिंग का शिकार हैं. सालाना आधार पर दिल्ली-एनसीआर में कीमतें 19%, हैदराबाद में 13% और बेंगलुरु में 12% तक बढ़ चुकी हैं. चिंता की बात यह है कि हैदराबाद में बिना बिके घरों को बेचने में 26 महीने और दिल्ली-एनसीआर में 19 महीने का समय लगेगा. ₹20 करोड़ से ₹50 करोड़ वाले सुपर-लक्जरी घरों की इन्वेंट्री में 40% का उछाल आया है. यही वजह है कि ऊंची कीमतों के कारण साल 2025 में कुल बिक्री वॉल्यूम में 12% की गिरावट आई, जो पिछले तीन साल का सबसे निचला स्तर है.
सवाल: भारत में घरों की मांग चीन के सट्टा बाजार से कितनी अलग है?
संतोष कुमार: भारत की मांग ‘एंड-यूज़र’ (वास्तविक खरीदार) द्वारा संचालित है, न कि केवल निवेश और सट्टेबाजी के लिए. भारत में शहरीकरण अभी सिर्फ 36% है, जिसका मतलब है कि अगले दो दशकों में करोड़ों लोग गांवों से शहरों की ओर आएंगे. यह जनसांख्यिकीय बदलाव घरों के लिए एक टिकाऊ और वास्तविक मांग पैदा करता है. चीन ने उस आबादी के लिए शहर बसाए जो कभी पैदा ही नहीं हुई, जबकि भारत बढ़ती आबादी के हिसाब से निर्माण कर रहा है.
सवाल: क्या भारत को बिना बिके लक्जरी घरों और मध्यम वर्ग की सामर्थ्य घटने से कोई बड़ा खतरा है?
संतोष कुमार: बिल्कुल, बाजार के शुरुआती आंकड़े तनाव की पुष्टि कर रहे हैं. भारत के शीर्ष शहरों में कुल बिना बिके घरों का आंकड़ा बढ़कर 5,09,000 यूनिट्स तक पहुंच गया है. बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में ₹40 लाख से कम वाले किफायती घरों की नई लॉन्चिंग लगभग खत्म हो चुकी है. बिल्डर्स केवल अमीर खरीदारों के लिए लक्जरी प्रोजेक्ट्स बना रहे हैं. यदि आम मध्यमवर्गीय खरीदार ऊंची कीमतों के कारण बाजार से बाहर रहा, तो आने वाले समय में रियल एस्टेट को ‘डिमांड एयर पॉकेट’ (मांग का अचानक ठप होना) का सामना करना पड़ सकता है. वैश्विक आर्थिक मंदी की स्थिति में हैदराबाद और एनसीआर के लक्जरी सेगमेंट में 10-15% तक की कीमत सुधार आ सकता है, हालांकि किसी बड़े क्रैश की आशंका नहीं है.
सवाल: नीति निर्माताओं, निवेशकों और आम खरीदारों को किन चेतावनी संकेतों पर नजर रखनी चाहिए?
संतोष कुमार: भारतीय रियल एस्टेट बाजार में आने वाले संकट को भांपने के लिए छह प्रमुख ‘रेड फ्लैग’ हैं:
18 महीने से अधिक का इन्वेंट्री ओवरहैंग: अगर किसी बाजार में बिना बिके घर 18 महीने से अधिक समय तक नहीं बिक पाते, तो वह क्षेत्र तनाव में है.
किफायती और लक्जरी का बिगड़ता अनुपात: सस्ते घरों की गिरती बिक्री यह बताती है कि वास्तविक खरीदार बाजार से दूर हो रहा है.
लोन-टू-इनकम रेशियो का बढ़ना: जब घर की ईएमआई (EMI) आम आदमी की मासिक आय से अधिक होने लगती है, तो मांग सीधे तौर पर प्रभावित होती है.
डेवलपर्स पर बढ़ता कर्ज: बिल्डर्स पर भारी कर्ज और उनके प्री-सेल कलेक्शन (नकद प्रवाह) में कमी उनके दिवालिया होने के शुरुआती संकेत हैं.
कमजोर 90-डे एब्जॉर्प्शन: यदि नए लॉन्च किए गए प्रोजेक्ट्स शुरुआती 90 दिनों में नहीं बिकते, तो यह मांग में कमजोरी को दर्शाता है.
विदेशी निवेश और एनआरआई फ्लो में कमी: रीट्स (REITs) में विदेशी निवेशकों (FPI) की घटती दिलचस्पी और एनआरआई निवेश में सुस्ती बाजार के प्रति वैश्विक अविश्वास का संकेत है.
संतोष कुमार के इस विश्लेषण से साफ है कि भारत का रियल एस्टेट बाजार बुनियादी रूप से मजबूत होने के बावजूद एक नाजुक मोड़ पर है. यदि डेवलपर्स ने समय रहते लक्जरी के मोह से बाहर निकलकर किफायती घरों पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, तो बाजार में बड़ी सुस्ती आ सकती है.


