Saturday, March 14, 2026

कुड़मी समाज ने रांची में अधिकार महारैली की, रैली में कुड़मी को ST का दर्जा देने की मांग की गई.

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रांची: झारखंड में कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने और कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की पुरानी मांग एक बार फिर जोर पकड़ गई. रांची के धुर्वा स्थित प्रभात तारा मैदान में बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति के बैनर तले आयोजित कुड़मी अधिकार महारैली में राज्य भर से बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष और युवा शामिल हुए.

यह महारैली कुड़मी समाज की एकजुटता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बनी, जहां हजारों लोग अपनी मांगों को लेकर हुंकार भरते नजर आए. इनकी मांग है कि एसटी दर्जा और कुड़माली भाषा को मान्यता. रैली में मुख्य रूप से दो प्रमुख मांगें उठाई गईं, कुड़मी-कुरमी (महतो) समुदाय को ओबीसी की बजाय अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल किया जाए और कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिया जाए.

Kurmi community Rally

वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि 1931 की जनगणना से पहले झारखंड क्षेत्र में कुड़मी समुदाय एसटी सूची में शामिल था, लेकिन बाद में साजिश के तहत इसे हटा दिया गया.

शीतल ओहदार का आक्रोशपूर्ण संबोधन

बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति के मुख्य संयोजक शीतल ओहदार ने कहा कि आज का यह जनसैलाब साबित करता है कि कुड़मी-महतो समाज जाग चुका है. हमारा खान-पान, रहन-सहन, पर्व-त्योहार, पूजा-पाठ और बोली-भाषा सब आदिवासियों से मेल खाता है. फिर हमें एसटी की जगह ओबीसी क्यों रखा गया? यह ऐतिहासिक अन्याय अब खत्म होना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर मांग पूरी नहीं हुई तो आंदोलन और तेज होगा.

Kurmi community Rally

डॉ. अमर चौधरी ने लोकतांत्रिक संघर्ष का जिक्र किया

रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव और कुड़मी समाज के शिक्षाविद डॉ. अमर चौधरी ने कहा कि हमारी पीढ़ियां लोकतांत्रिक तरीके से हक मांगती आई हैं, रेल रोको आंदोलन भी किया गया. आज का यह जनसैलाब दिखाता है कि हम अपना अधिकार लेकर रहेंगे. जरूरत पड़ी तो दिल्ली तक आंदोलन जाएगा. केंद्र सरकार और भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना होगा अगर कुड़माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया और कुड़मी को एसटी दर्जा नहीं मिला.

ऐतिहासिक अन्याय का दावा

वक्ताओं ने बताया कि कुड़मी समाज सरकारी योजनाओं से वंचित रहता है. बच्चों को शिक्षा, रोजगार और आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिल पाता. उन्होंने कहा कि जब सब कुछ आदिवासियों जैसा है, तो एसटी दर्जा क्यों नहीं?

विरोध की राजनीति भी गरमाई

महारैली ऐसे समय में हुई है जब आदिवासी संगठनों की ओर से पहले ही विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं. कुछ आदिवासी नेता कुड़मी को एसटी में शामिल करने का विरोध करते हैं और इसे सामाजिक संतुलन बिगाड़ने वाला बताते हैं. रैली में कुड़मी नेताओं ने इसे “जवाबी प्रदर्शन” करार दिया.

रैली में शामिल लोगों ने संकल्प लिया कि मांग पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा. यह आयोजन 18 कुड़मी संगठनों के संयुक्त प्रयास से हुआ, जिसे ऐतिहासिक बनाने का दावा किया गया. झारखंड की राजनीति में यह मुद्दा अब और संवेदनशील हो गया है.

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