रांची: झारखंड में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के क्रियान्वयन को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में कई गंभीर कमियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 से 2024 के बीच बड़ी संख्या में मनरेगा योजनाएं अधूरी रहीं, जबकि अकुशल श्रमिकों की 321.84 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान भी लंबित पाया गया।
CAG ने मनरेगा की स्थिति, योजनाओं के क्रियान्वयन और इसके निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति का आकलन करने के लिए राज्य के छह जिलों का ऑडिट किया। इनमें पूर्वी सिंहभूम, गढ़वा, गिरिडीह, गोड्डा, गुमला और पाकुड़ शामिल थे। जांच के दौरान 12 प्रखंडों, 48 ग्राम पंचायतों और 480 योजनाओं का भौतिक सत्यापन किया गया।
मजदूरी मद की राशि से वाहनों पर खर्च
ऑडिट में यह भी सामने आया कि गिरिडीह, गुमला और पाकुड़ में मनरेगा की मजदूरी मद की राशि का इस्तेमाल पुराने वाहनों के रखरखाव में किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 से 2022 के बीच करीब 32.62 लाख रुपये टायर, बैटरी और अन्य वाहन संबंधी सामान पर खर्च किए गए।
CAG ने इसे मनरेगा के प्रावधानों के विपरीत बताया है, क्योंकि योजना के तहत निर्धारित मजदूरी मद की राशि को दूसरे उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
321.84 करोड़ रुपये मजदूरी का भुगतान बाकी
रिपोर्ट के मुताबिक, 2019-24 की अवधि में अकुशल श्रमिकों को कुल 321.84 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान लंबित था। ऑडिट में पाया गया कि मार्च 2025 तक भी यह राशि श्रमिकों को नहीं मिल सकी थी।
करीब आधी योजनाएं अधूरी
मनरेगा योजनाओं की प्रगति को लेकर भी रिपोर्ट में चिंता जताई गई है। 2019 से 2024 के बीच राज्य में मनरेगा से जुड़ी करीब 1.02 करोड़ योजनाओं में से 27.96 लाख योजनाएं ही पूरी हो सकीं। यह कुल योजनाओं का लगभग 27 प्रतिशत है।
वहीं, करीब 50.21 लाख योजनाएं यानी लगभग 49 प्रतिशत योजनाएं जांच अवधि के अंत तक अधूरी पाई गईं। लगभग 24 प्रतिशत योजनाओं पर काम शुरू तक नहीं हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2024 तक मनरेगा योजनाओं पर करीब 2,633 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे।
100 दिन का रोजगार देने के लक्ष्य पर भी सवाल
मनरेगा के तहत पात्र परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान है। CAG की जांच में पाया गया कि राज्य स्तर पर केवल करीब 2 से 4 प्रतिशत परिवार ही 100 दिनों का रोजगार पूरा कर सके।
ऑडिट के लिए चुने गए छह जिलों में स्थिति और भी सीमित रही। यहां केवल लगभग 1 से 2 प्रतिशत परिवारों को ही 100 दिनों का रोजगार मिल पाया।
CAG की रिपोर्ट में सामने आए ये आंकड़े मनरेगा के तहत योजनाओं के क्रियान्वयन, मजदूरी भुगतान और रोजगार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
