रांची: बोकारो स्टील प्लांट (BSL) टाउनशिप और बोकारो शहर में सेल तथा सरकारी जमीन से कथित अतिक्रमण हटाने की मांग वाली जनहित याचिका को झारखंड हाईकोर्ट ने निष्पादित कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित अधिकारी अतिक्रमण हटाने और आवास खाली कराने के मामलों में कार्रवाई कर रहे हैं। ऐसे में अदालत को अलग से निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं दिखी।
यह जनहित याचिका अधिवक्ता भगवान प्रसाद साहू की ओर से दायर की गई थी। इसमें बोकारो में जमीन पर कथित अवैध निर्माण हटाने और बीएसएल के आवंटित आवासों में निर्धारित अवधि से अधिक समय तक रह रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी।
500 एकड़ जमीन पर निर्माण हटाने की मांग
याचिका में बीएसएल के राज्य अधिकारी की ओर से केस संख्या ए/ई/51/2012 में पारित आदेश का अनुपालन कराने का आग्रह किया गया था। याचिकाकर्ता के अनुसार, सेल की लगभग 500 एकड़ जमीन पर करीब 4,000 कच्चे-पक्के मकान और खटाल बने हुए हैं। याचिका में इन अनधिकृत निर्माणों को हटाने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि बीएसएल प्रबंधन और राज्य प्रशासन के बीच समन्वय की कमी के कारण अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई प्रभावी तरीके से आगे नहीं बढ़ पा रही है।
271 अतिक्रमण और 1,292 आवास मामलों का हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी का हवाला देते हुए बताया कि अतिक्रमण से संबंधित करीब 271 मामले लंबित हैं। इसके अतिरिक्त, बीएसएल के आवंटित आवासों में निर्धारित समय से अधिक अवधि तक रहने वाले लोगों के खिलाफ लगभग 1,292 कार्यवाहियां लंबित होने की बात कही गई।
याचिका में इन मामलों के जल्द निष्पादन और जमीन तथा आवासों को खाली कराने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की गई थी।
बीएसएल ने अदालत में क्या कहा?
बीएसएल की ओर से अदालत को बताया गया कि अतिक्रमण हटाने और आवास खाली कराने के मामलों में नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है। प्रबंधन के अनुसार, कई मामलों में बेदखली के आदेश भी पारित किए जा चुके हैं।
हालांकि, ऐसे आदेशों को लागू कराने के लिए राज्य प्रशासन और पुलिस का सहयोग जरूरी है। बीएसएल ने अदालत को बताया कि इस संबंध में संबंधित अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रभावित लोगों को पक्षकार नहीं बनाने पर अदालत की टिप्पणी
खंडपीठ ने कहा कि जनहित याचिका में पर्याप्त विस्तृत तथ्य नहीं दिए गए थे। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि जिन लोगों को अतिक्रमणकारी बताया गया है या जो आवंटित आवासों में निर्धारित अवधि से अधिक समय से रह रहे हैं, उन्हें याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया।
ऐसी स्थिति में संबंधित लोगों के हितों को प्रभावित करने वाले व्यापक निर्देश देना उचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से अधिकारियों की पूरी निष्क्रियता साबित नहीं होती, क्योंकि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और बेदखली के आदेशों की जानकारी सामने आई है।
बेदखली के आदेशों पर कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएसएल को बेदखली के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना चाहिए। इसके लिए राज्य प्रशासन से भी आवश्यक सहयोग अपेक्षित है।
हालांकि, बेदखली की कार्रवाई संबंधित व्यक्तियों को सक्षम अदालत या अपीलीय प्राधिकरण से मिले किसी अंतरिम अथवा अंतिम आदेश के अधीन रहेगी।
खंडपीठ ने पुराने आदेशों की कथित अवहेलना के संबंध में भी कहा कि संबंधित आदेश लगभग 10 से 15 वर्ष पहले पारित हुए थे और उनके अनुपालन न होने को लेकर अब तक कोई कार्यवाही शुरू किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई।
इस तरह हाईकोर्ट ने मामले में अतिरिक्त निर्देश जारी किए बिना जनहित याचिका को निष्पादित कर दिया।
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