अलार्म की तेज आवाज से जागना, तुरंत मोबाइल की स्क्रीन देखना और ईमेल, WhatsApp मैसेज, सोशल मीडिया नोटिफिकेशन या न्यूज अपडेट चेक करना, ज्यादातर लोग सुबह यही रूटीन फॉलो करते हैं. पहली नजर में इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता है. इस तरह के रेगुलर रूटीन से मानसिक सुरक्षा और स्थिरता का एहसास होता है. लेकिन क्या इस आदत का असर दिन की शुरुआत में ही हमारे स्ट्रेस लेवल पर पड़ता है? जानिए सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल के क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, डॉ. मेहजबीन डोरडी का इसपर क्या कहना है…
डॉ. मेहजबीन डोरडी मानती हैं कि हां, ये आदतें स्ट्रेस लेवल पर असर डालती हैं, हालांकि शायद उस तरह से नहीं जैसा सोशल मीडिया आपको यकीन दिलाता है. उनका कहना है कि असल मुद्दा सिर्फ मोबाइल फोन का नहीं है, सबसे जरूरी बात यह है कि फोन अनलॉक करते ही आपकी नजर किस चीज पर पड़ती है. सोचिए, आप बिस्तर से उठते हैं और तुरंत कम से कम दस अनरीड (बिना पढ़े) वर्क ईमेल, कोई जरूरी मैसेज, बुरी खबर या किसी का फेसबुक स्टेटस देखते हैं, जिससे आप खुद की तुलना उनसे करने लगते हैं. ये आदतें सीधे आपके नर्वस सिस्टम के ‘फाइट ऑर फ्लाइट’ मोड को एक्टिवेट कर देती हैं, जिससे शरीर में कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का लेवल तेजी से बढ़ जाता है, इससे थकान, एंग्जायटी और दिन भर ध्यान लगाने में मुश्किल हो सकती है.
कॉर्टिसोल क्या होता है?
डॉ. मेहजबीन डोरडी का कहना है कि कॉर्टिसोल को आमतौर पर ‘स्ट्रेस हार्मोन’ (तनाव का हार्मोन) कहा जाता है, लेकिन इसका काम सिर्फ तनाव बढ़ाना ही नहीं है, यह शरीर के सबसे जरूरी कामों को भी कंट्रोल करता है. यह एड्रिनल ग्रंथियों से बनने वाला एक जीवन रक्षक स्टेरॉयड हार्मोन है, जो हमारे जीवित रहने के लिए जरूरी है. कॉर्टिसोल शरीर में कई जरूरी काम करता है, जिनमें एनर्जी लेवल और मेटाबॉलिज्म को मैनेज करना शामिल है. इसके साथ ही, यह ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है और शरीर के इम्यून रिस्पॉन्स को एडजस्ट करके लंबे समय से चली आ रही या अंदरूनी सूजन को कम करता है. यह ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में मदद करता है और नींद के चक्र (जिसे सर्केडियन रिदम कहते हैं) को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है.

क्या आपका फोन एक्स्ट्रा स्ट्रेस रिस्पॉन्स की वजह बन रहा है?
डॉ. मेहजबीन डोरडी का कहना है कि प्रॉब्लम मोबाइल फोन से नहीं होती है बल्कि, जरूरी बात यह है कि जब आप इसे अनलॉक करते हैं तो सबसे पहले आपकी नजर किस चीज पर पड़ती है. आपका स्मार्टफोन निश्चित रूप से आपके शरीर में बहुत ज्यादा स्ट्रेस रिस्पॉन्स को ट्रिगर कर सकता है, जब लगातार नोटिफिकेशन, जागते ही तुरंत फोन चेक करने की आदत, और सोशल मीडिया की कभी न खत्म होने वाली दुनिया आपके नर्वस सिस्टम को ‘फाइट-या-फ्लाइट’ मोड में बंद कर देती है, जिससे कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन का लेवल बढ़ जाता है.
उन्होंने आगे कहा कि साइकोलॉजिकल नजरिए से देखें तो, यह आपके दिमाग को दिन में सेटल होने से पहले ही रिएक्शन मोड में डाल देता है. हालांकि, मोबाइल फोन देखने के बाद बड़ी मात्रा में कॉर्टिसोल के अपने-आप रिलीज होने के बारे में रिसर्च से कोई सबूत नहीं मिला है, लेकिन कुछ वैज्ञानिक सबूत बताते हैं कि स्ट्रेस देने वाली चीजें और जानकारी देखने और लगातार नोटिफिकेशन मिलने से एंग्जायटी और स्ट्रेस का लेवल बढ़ सकता है. जब स्ट्रेस महसूस होता है, तो स्ट्रेस रिस्पॉन्स सिस्टम एक्टिवेट हो जाता है.
डॉ. मेहजबीन डोरडी ने बताया कि सोने के बाद भी जागते ही थकान महसूस होना खराब नींद और मानसिक थकान की निशानी है. जब रात में आराम करने के बजाय दिमाग बहुत ज्यादा एक्टिव रहता है या विचारों में उलझा रहता है, तो कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का लेवल बढ़ जाता है, जिससे शरीर की ऊर्जा खत्म होने लगती है. इसके साथ ही उठते ही फोन पर झपटने की हमारी आदत मस्तिष्क के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ सकती है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के अनुसार, सुबह जागने के तुरंत बाद स्क्रीन देखने से नर्वस सिस्टम पर दबाव पड़ता है और कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर तेजी से बढ़ जाता है.

सुबह-सुबह सोशल मीडिया देखने का असर
डॉ. मेहजबीन डोरडी मानती हैं कि कभी-कभी, दिन की शुरुआत में सोशल मीडिया परेशानियां पैदा कर सकता है. दूसरों की सफलता की कहानियों, यात्राओं, निजी जिंदगी या वर्कआउट रूटीन की चुनिंदा तस्वीरें देखने से आपके मूड और आत्मविश्वास पर असर पड़ सकता है. वैज्ञानिक रिसर्च से लगातार यह पता चलता है कि स्मार्टफोन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल कई लोगों में तनाव बढ़ने, ध्यान न लग पाने और मानसिक दबाव महसूस होने का कारण बन सकता है. इसलिए सुबह उठते ही फोन से जितना हो सके दूरी बनाकर रखें…
इस तरह करें सुबह की शुरुआत
डॉ. मेहजबीन डोरडी का कहना है कि सुबह के समय आपको अपना फोन पूरी तरह से छोड़ने की जरूरत नहीं है, लेकिन सुबह उठने और सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करने के बीच थोड़ा गैप रखने की कोशिश करें. सिर्फ 15 से 30 मिनट भी काफी फर्क ला सकता है. इस दौरान, आप थोड़ा घूम सकते हैं, थोड़ा पानी पी सकते हैं, अपने साथ कुछ शांत समय बिता सकते हैं, धूप में बाहर जा सकते हैं, या जो कुछ भी आपको पसंद हो वह कर सकते हैं. असल में, आपका लक्ष्य यह होना चाहिए कि समस्याओं से निपटने से पहले आपका दिमाग जाग जाए.
दिन की शुरुआत में बुरी खबरें या डिमांडिंग मैसेज पढ़ने से मेंटल शांति और एनर्जी खत्म हो सकती है. इसे इग्नोर करना एक अच्छी आदत है, जिसे ‘डिजिटल डिटॉक्स’ भी कहते हैं. सुबह थोड़ी देर के लिए फोन का इस्तेमाल टालना आपके दिन की सही शुरुआत करने का सबसे आसान तरीका हो सकता है.


