Wednesday, April 15, 2026

सिस्टेमैटिक्स के अनुसार, Q4 में राजस्व 12% बढ़ेगा, लेकिन अमेरिकी दवाओं के गिरते मुनाफे और बढ़ती लागत से कुल लाभ 14% तक घट सकता है.

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नई दिल्ली: भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लिए वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही (Q4 FY26) मिली-जुली रहने वाली है. दिग्गज ब्रोकरेज फर्म ‘सिस्टेमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान हेल्थकेयर कंपनियों के राजस्व में एक अंकों की सम्मानजनक वृद्धि देखी जा सकती है, लेकिन मार्जिन और शुद्ध लाभ के मोर्चे पर भारी दबाव रहने की आशंका है.

राजस्व में वृद्धि, लेकिन कमाई में गिरावट
रिपोर्ट के मुताबिक, इस सेक्टर की कंपनियों का मीडियन रेवेन्यू करीब 12% की दर से बढ़ने का अनुमान है. हालांकि, मुनाफे के मामले में तस्वीर उतनी गुलाबी नहीं है. कंपनियों के एबिटा मार्जिन में बड़ी गिरावट आने की संभावना है, जिसकी वृद्धि दर मात्र 3.6% रह सकती है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि सेक्टर की शुद्ध कमाई में पिछले साल के मुकाबले 14% की गिरावट देखी जा सकती है.

‘जी-रेवलिमिड’ (gRevlimid) का असर
इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण अमेरिका में कैंसर की दवा ‘रेवलिमिड’ के जेनरिक संस्करण (gRevlimid) की एक्सक्लूसिविटी का खत्म होना है. अब तक यह दवा कई भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए ऊंचे मार्जिन और मोटी कमाई का जरिया थी. अब इस ‘जेनरिक क्लिफ’ की वजह से बड़ी निर्यातक कंपनियों के लिए बेस रिसेट हो रहा है, जिससे उनके कुल लाभ पर सीधा असर पड़ रहा है.

भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती लागत
रिपोर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष को भी एक बड़े जोखिम के रूप में चिन्हित किया गया है. हालांकि, डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना आमतौर पर निर्यातकों के लिए अच्छा होता है, लेकिन इस बार स्थिति अलग है. संघर्ष की वजह से लॉजिस्टिक्स और कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल आया है. यह बढ़ती लागत मुद्रा विनिमय से होने वाले लाभ को पूरी तरह खत्म कर रही है.

इसके अलावा, लैनरियोटाइड जैसे प्रमुख उत्पादों की आपूर्ति में बाधा और मिराबिग्रोन से जुड़े रॉयल्टी भुगतान के कारण भी कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ गया है.

कच्चे माल की महंगाई का चक्र
एपीआई (API) निर्माता कंपनियां कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत का बोझ अब फॉर्मूलेशन बनाने वाली कंपनियों पर डाल रही हैं. फॉर्मूलेशन कंपनियां भी भविष्य की अनिश्चितता और आपूर्ति में रुकावट के डर से अपने पास इन्वेंट्री (स्टॉक) बढ़ा रही हैं. यह रणनीति उन्हें भविष्य के संकट से तो बचा सकती है, लेकिन फिलहाल उनकी कार्यशील पूंजी पर दबाव डाल रही है.

उम्मीद की किरण: घरेलू बाजार और अस्पताल
इतनी चुनौतियों के बावजूद कुछ क्षेत्र मजबूती से खड़े हैं

घरेलू बाजार: भारत में दवाओं का कारोबार स्थिर है. पुरानी बीमारियों की दवाओं और नए उत्पादों की लॉन्चिंग से इस सेगमेंट को सहारा मिल रहा है.

अस्पताल और डायग्नोस्टिक्स: अस्पताल क्षेत्र में 15% की वृद्धि की उम्मीद है, जो बिस्तरों की बढ़ती संख्या और मरीजों की आवक पर आधारित है.डायग्नोस्टिक सेंटर भी 15% की बिक्री वृद्धि देख सकते हैं.

रिटेल फार्मेसी: मेडप्लस (22%) और अपोलो हेल्थको (20%) जैसे रिटेल दिग्गजों के शानदार प्रदर्शन की उम्मीद है.

संक्षेप में कहें तो, हेल्थकेयर सेक्टर इस समय बदलाव के दौर से गुजर रहा है. जहां एक ओर राजस्व बढ़ रहा है, वहीं कमाई की ‘गुणवत्ता’ कमजोर हो रही है. आने वाले समय में बाजार की नजर कच्चे माल की कीमतों, मध्य पूर्व के तनाव और अमेरिका में नए उत्पादों की मंजूरी मिलने की गति पर टिकी रहेगी.

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