Monday, November 2, 2026

वेदांता आर्बिट्रेशन मामले में केंद्र को सुप्रीम कोर्ट से झटका, अदालत की तल्ख टिप्पणी—‘कोई भरोसा नहीं करेगा’

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New Delhi News | 2 नवंबर 2026: वेदांता लिमिटेड और राव्वा ऑयल सिंगापुर से जुड़े विदेशी मध्यस्थता फैसलों को लागू करने के मामले में केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली केंद्र की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी। यह विवाद करीब 99 मिलियन डॉलर यानी लगभग 830 करोड़ रुपये के दावों से जुड़ा है।

दो दशक पुराने फैसलों का विरोध करने पर अदालत की नाराजगी

सोमवार को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने मामले की सुनवाई की। केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी पेश हुए। वहीं, वेदांता और राव्वा ऑयल की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अखिल सिबल ने पक्ष रखा।

सुनवाई के दौरान अदालत ने दो दशक से अधिक पुराने मध्यस्थता फैसलों को लागू करने में लगातार आपत्ति जताने पर केंद्र सरकार के रुख पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि जब विदेशी अदालतों में विवाद का निपटारा हो चुका है, तो इसके बावजूद आर्बिट्रेशन अवॉर्ड लागू करने में बाधा क्यों डाली जा रही है?

‘इस तरह कोई आप पर भरोसा नहीं करेगा’

पीठ ने मध्यस्थता प्रक्रिया को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाया। अदालत ने टिप्पणी की कि एक तरफ भारत को मध्यस्थता के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर फैसलों को लागू करने के चरण में इस तरह की अड़चनें पैदा की जा रही हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि इस तरह की लंबी कानूनी लड़ाई से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और उन पक्षों के बीच गलत संदेश जाएगा, जो विवादों के निपटारे के लिए भारत को चुनना चाहते हैं।

पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा, “हम मध्यस्थता, सीट और इन तमाम बड़ी-बड़ी बातों की चर्चा करते हैं। इस तरह तो कोई भी आप पर भरोसा नहीं करेगा।”

हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया

सुप्रीम कोर्ट ने 1 जुलाई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने कुआलालंपुर स्थित मध्यस्थता न्यायाधिकरण के वर्ष 2004 और 2016 के फैसलों को लागू करने के खिलाफ केंद्र सरकार की आपत्तियां खारिज कर दी थीं।

शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हाई कोर्ट ने विवाद से जुड़े सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार किया था और उसका फैसला कानूनी रूप से भी सही था। इसके बाद पीठ ने केंद्र सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।

1994 के प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा है विवाद

पूरा मामला कृष्णा-गोदावरी बेसिन में राव्वा तेल क्षेत्र के विकास से संबंधित है। वर्ष 1994 में इस परियोजना के लिए केंद्र सरकार और एक कंसोर्टियम के बीच प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट हुआ था।

इस कंसोर्टियम में ओएनजीसी, वीडियोकॉन पेट्रोलियम, राव्वा ऑयल और केर्न एनर्जी शामिल थे। बाद में केर्न एनर्जी का संबंधित हिस्सा केर्न इंडिया और फिर वेदांता के पास चला गया।

इसी अनुबंध से जुड़े विवादों पर कुआलालंपुर स्थित मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने 2004 और 2016 में फैसले सुनाए थे। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र की याचिका खारिज किए जाने के बाद इन मध्यस्थता फैसलों को लागू करने के रास्ते में केंद्र की ओर से उठाई गई आपत्तियों को राहत नहीं मिली है।

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