Friday, September 18, 2026

लुगुबुरु पहाड़ी पर विकसित संताल संविधान का दस्तावेजीकरण, 350 पन्नों की पुस्तक तैयार.

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बोकारो/रांची: संताल आदिवासी समाज की परंपराओं, सामाजिक व्यवस्था और जल-जंगल-जमीन से जुड़े अधिकारों को अब पुस्तक के रूप में दर्ज किया गया है। बोकारो स्थित करीब 2000 फीट ऊंची लुगुबुरु पहाड़ी पर लंबे वैचारिक मंथन से विकसित संतालों के मौखिक संविधान पर 350 पन्नों की शोधपरक कॉफी टेबल बुक तैयार की गई है।

इस पुस्तक का नाम ‘लुगुबुरु घंटाबाड़ी : संताल आदिवासियों का संविधान’ रखा गया है। रांची के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सोमनाथ आर्य ने इस पर शोध कर पुस्तक लिखी है। इसका प्रकाशन ‘और एक प्रयास’ संस्था कर रही है। पुस्तक तैयार करने में झारखंड सरकार के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय का भी सहयोग बताया गया है।

संताल समाज की परंपराओं और नियमों का संकलन

पुस्तक में संताल समाज के उन पारंपरिक और मौखिक नियमों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है, जो पीढ़ियों से सामाजिक जीवन, सामुदायिक व्यवस्था तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का आधार रहे हैं। शोध के जरिए इस विरासत को व्यापक स्तर पर सामने लाने का प्रयास किया गया है।

लेखक के अनुसार, लुगुबुरु पहाड़ी संताल समाज के लिए केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि उनकी ऐतिहासिक स्मृतियों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल भी है।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने सराहा

पुस्तक की प्रस्तावना राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लिखी है। प्रस्तावना में उन्होंने लुगुबुरु को आदिवासी समाज की जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने वाला पवित्र स्थल बताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पहल को ऐतिहासिक महत्व का कार्य बताया है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित अन्य नेताओं ने भी पुस्तक को जनजातीय अस्मिता और परंपरागत ज्ञान का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया है।

पहाड़ी पर मौजूद ऐतिहासिक प्रमाणों का उल्लेख

पुस्तक में लुगुबुरु पहाड़ी से जुड़े कई ऐतिहासिक और धार्मिक प्रमाणों का वर्णन किया गया है। दोरबार चट्टान पर बने उखल के निशानों को उस लंबे वैचारिक मंथन से जोड़कर देखा गया है, जिसके बाद संताल संविधान का स्वरूप विकसित हुआ।

इसके अलावा, सीता नाला को अत्यंत पवित्र जलस्रोत माना जाता है। वहीं, धोरोम दोलान गुफा से पूरे वर्ष पानी रिसने की बात भी पुस्तक में दर्ज की गई है। इन स्थलों को संताल समाज की आस्था और सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है।

हर साल जुटते हैं देश-विदेश से श्रद्धालु

लुगुबुरु को झारखंड के राजकीय महोत्सव का दर्जा प्राप्त है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। समिति के अनुसार, करीब 14 देशों से लोग यहां आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ आते हैं।

पुस्तक के शोध कार्य में फिनलैंड की कंपनी सॉफ्टा एआई और लुगुबुरु समिति के अध्यक्ष बबुली सोरेन का भी सहयोग रहा है। इस वर्ष के आयोजन में राष्ट्रपति की संभावित भागीदारी को लेकर भी तैयारी की सूचना दी गई है।

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