बिहार में 40 साल बाद ऐसी भीषण सर्दी पड़ रही है, जिसने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। दिसंबर से जनवरी तक 22 कोल्ड डे दर्ज हुए हैं, और समस्तीपुर में 27 साल का रिकॉर्ड टूटा है। पश्चिमी विक्षोभ के कारण आई इस ठंड से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई हैं, हार्ट अटैक और ब्रेन हेमरेज के मामले बढ़े हैं। यात्रा, कृषि और पशुपालन पर भी असर पड़ा है। 15 जनवरी के बाद आंशिक राहत की उम्मीद है।
पटना। बिहार इन दिनों उस सर्दी का सामना कर रहा है, जिसे लोग दशकों तक याद रखेंगे। यह सिर्फ तापमान गिरने की खबर नहीं है, बल्कि एक ऐसा मौसमीय दौर है जिसने आम जीवन, स्वास्थ्य, खेती, यात्रा और प्रशासन, हर स्तर पर असर डाला है। मौसम विज्ञानियों के मुताबिक राज्य में 40 साल बाद इतनी लंबी और तीखी सर्दी दर्ज की जा रही है। दिसंबर से जनवरी तक कुल 22 दिन कोल्ड डे रह चुके हैं, जो सामान्य से 8 दिन ज्यादा है। समस्तीपुर में तो 27 साल पुराना रिकॉर्ड टूट चुका है, जहां न्यूनतम तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, मानो 1998 की सर्दी फिर लौट आई हो।
पहाड़ों से मैदान तक ठंड की कहानी
इस असामान्य ठंड की जड़ें हजारों किलोमीटर दूर हैं। भूमध्य सागर क्षेत्र में बने पश्चिमी विक्षोभ जब उत्तरी भारत के ऊपर से गुजरे, तो हिमालयी इलाकों में जमकर बर्फबारी हुई। पहाड़ों से फिसलकर आई ठंडी हवाएं पाकिस्तान, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान को पार करती हुई बिहार तक पहुंचीं। नतीजा, मैदानी इलाकों में कंपकंपा देने वाली ठंड, घना कोहरा और दिन में भी धूप की कमजोरी।
मौसम विभाग का कहना है कि 10 जनवरी तक पटना, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, सहरसा और गया जैसे जिलों में कोल्ड डे जैसी स्थिति बनी रह सकती है। राहत की उम्मीद 15 जनवरी के बाद ही है, वो भी आंशिक।
जनवरी: सर्दी का असली इम्तिहान
मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पूरा जनवरी ठंडा रहेगा। अगले कुछ दिनों में अधिकतम तापमान में खास बदलाव नहीं होगा, लेकिन न्यूनतम तापमान 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक और गिर सकता है। खासकर पश्चिमी बिहार के 11 जिलों, पश्चिमी व पूर्वी चंपारण, सीवान, छपरा, गोपालगंज, बक्सर, भोजपुर, रोहतास, भभुआ, औरंगाबाद और अरवल, में शीतलहर लंबे समय तक टिक सकती है।
दिन में धूप निकलेगी, लेकिन रात की ठंड और तेज होगी। यही वजह है कि लोग दिन-रात दोनों समय ठिठुरन महसूस कर रहे हैं।
कोल्ड डे, शीतलहर और विंड चिल—आम आदमी की भाषा में
जब न्यूनतम तापमान मैदानी इलाकों में 10 डिग्री या उससे कम हो जाए और अधिकतम तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री तक गिर जाए, तो उसे कोल्ड डे कहा जाता है। अगर गिरावट 6.4 डिग्री से ज्यादा हो, तो वह भीषण शीत दिवस बन जाता है।
शीतलहर तब और खतरनाक हो जाती है, जब ठंडी हवा की गति बढ़ जाती है। हवा के बहाव से शरीर पर पड़ने वाला असर, विंड चिल, ठंड को और जानलेवा बना देता है।
अस्पतालों पर बढ़ता दबाव
इस ठंड ने स्वास्थ्य तंत्र की भी परीक्षा ली है। बीते कुछ दिनों में हार्ट अटैक और ब्रेन हेमरेज के मामलों में 30–35% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। तीन दिनों में दो दर्जन से ज्यादा मौतें सिर्फ ठंड से जुड़ी जटिलताओं के कारण हुईं।
पटना के PMCH सहित राज्य के बड़े अस्पतालों में ICU और इमरजेंसी वार्ड भरे पड़े हैं। डॉक्टरों के मुताबिक बीपी, हृदय रोग और सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीज तेजी से बढ़े हैं।
फिजिशियन डॉ. राजीव कुमार सिंह कहते हैं, ‘बुजुर्गों और बच्चों पर ठंड का असर सबसे ज्यादा है। मॉर्निंग वॉक कुछ दिनों के लिए टाल दें, कमरे में लकड़ी या कोयला जलाने से बचें, और गर्म कपड़े, गुनगुना पानी व गर्म भोजन को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।’
कोहरा: अदृश्य दुश्मन
सुबह-शाम छाने वाला घना कोहरा सिर्फ दृश्यता ही नहीं घटा रहा, बल्कि दिन के तापमान को भी दबाकर रखे हुए है। कोहरा सूरज की किरणों को जमीन तक पहुंचने नहीं देता।
हवा गर्म होकर ऊपर नहीं उठ पाती, जिससे प्रदूषण भी फंसा रहता है। नतीजा, दिन में भी कंपकंपी, और रात में सिहरन।
सफर बना मुसीबत
कोहरे ने परिवहन व्यवस्था को भी पटरी से उतार दिया है। ट्रेनें घंटों देरी से चल रही हैं, मगध एक्सप्रेस 7 घंटे, संपूर्ण क्रांति और राजधानी जैसी ट्रेनें भी घंटों लेट।
पटना एयरपोर्ट पर विजिबिलिटी कम रहने से कई फ्लाइट रद्द या लेट रहीं। टर्मिनल पर यात्रियों की भीड़ और ठंड से जूझते लोग, यह तस्वीर आम हो गई है।
सर्दी से जूझता आम आदमी
पटना के गोल बताते हैं, दिमाग की बीमारी है। ठंड में ज्यादा सावधानी रखनी पड़ रही है। सुबह खाना खाकर फिर बिस्तर में दुबक जाता हूं। इतनी ठंड है कि पूरा दिन कमरे में बंद रहना पड़ता है।
सरकार की तैयारी और राहत
सरकार ने पंचायत स्तर पर अलाव जलाने की व्यवस्था की है। 3 जनवरी तक 5733 जगहों पर अलाव जलाए गए, 12 लाख किलो से ज्यादा लकड़ियां इस्तेमाल हुईं। 85 रैन बसेरे बनाए गए, जहां 16 हजार से ज्यादा लोगों ने शरण ली। करीब 34 हजार कंबल बांटे गए।
खेत-खलिहान और पशुपालन पर असर
ठंड और पाले से रबी फसलों, गाजर, मटर, टमाटर, धनिया, लहसुन. में झुलसा रोग का खतरा बढ़ गया है। कृषि विशेषज्ञों ने फफूंदनाशक दवाओं के छिड़काव की सलाह दी है।
पशुपालकों के लिए भी चुनौती है। दुधारू पशुओं का दूध कम हो रहा है। समाधान के तौर पर संतुलित चारा, खनिज मिश्रण और सूखी घास का बिछावन जरूरी बताया गया है।
आखिर कब मिलेगी राहत?
मौसम विभाग की मानें तो 15 जनवरी के बाद आसमान साफ हो सकता है। धूप निकलेगी, लेकिन रात की ठंड अभी पीछा नहीं छोड़ेगी।
फिलहाल बिहार एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां सर्दी सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि एक अनुभव बन चुकी है.ऐसा अनुभव, जो 40 साल बाद इतिहास में दर्ज हो रहा है।


