Wednesday, April 22, 2026

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) उपग्रहों और अंतरिक्ष मलबे को ट्रैक करने के प्रयासों को तेज़ कर रहा है, क्योंकि पृथ्वी की निचली कक्षा में मलबे का भंडार बढ़ता जा रहा है

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) उपग्रहों और अंतरिक्ष मलबे को ट्रैक करने के प्रयासों को तेज़ कर रहा है, क्योंकि पृथ्वी की निचली कक्षा में मलबे का भंडार बढ़ता जा रहा है. इस योजना का एक अहम हिस्सा लद्दाख के हानले में एक ऑप्टिकल टेलीस्कोप लगाना है. हानले एक ऊंचाई पर स्थित ठंडा रेगिस्तान है, जो अपने साफ़ और गहरे आसमान के लिए जाना जाता है. इस फेसेलिटी से कक्षा में मौजूद चीज़ों पर नज़र रखने और टकराव के जोखिम को कम करने की भारत की क्षमता मज़बूत होने की उम्मीद है.

2025 के लिए अपनी ‘इंडियन स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस रिपोर्ट’ में ISRO ने बताया कि हानले टेलीस्कोप पर काम चल रहा है. एजेंसी ने अंतरिक्ष में मौजूद चीज़ों को ट्रैक करने के लिए एक स्वदेशी ‘फेज़्ड ऐरे रडार’ का डिज़ाइन और रिव्यू भी पूरा कर लिया है.

इस रडार को देश के उत्तर-पूर्वी हिस्से में लगाने की कोशिशें जारी हैं. इसके साथ ही, ट्रैकिंग क्षमता को बढ़ाने के लिए ‘आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऑब्ज़र्वेशनल साइंसेज़’ के सहयोग से नैनीताल में मौजूद ‘बेकर नन श्मिट टेलीस्कोप’ का नवीनीकरण किया जा रहा है.

ISRO अभी आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सैटेलाइट, रॉकेट के हिस्सों और मलबे पर नज़र रखने के लिए मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार का इस्तेमाल करता है. यह सिस्टम 1,000 km तक की दूरी पर मौजूद कई चीज़ों को ट्रैक कर सकता है. रडार रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करके दिन-रात काम करते हैं.

ऑप्टिकल टेलीस्कोप सिर्फ़ रात में काम करते हैं, लेकिन सैटेलाइट से टकराकर वापस आने वाली सूरज की रोशनी को पकड़कर सटीक जानकारी देते हैं. अधिकारियों ने बताया कि एक भरोसेमंद ट्रैकिंग नेटवर्क बनाने के लिए इन दोनों सिस्टम की ज़रूरत है.

A view of Hanle space observatory in Ladakh

लद्दाख को चुनने की वजह इसकी भौगोलिक स्थिति है. यह क्षेत्र ऊंचाई पर स्थित है, यहां का वातावरण विरल है और प्रकाश प्रदूषण (light pollution) भी बहुत कम है. ये स्थितियां अंतरिक्ष में मौजूद धुंधली वस्तुओं को ज़्यादा बेहतर ढंग से देखने में मदद करती हैं. ट्रैकिंग स्टेशनों के एक व्यापक नेटवर्क की ज़रूरत इसलिए होती है, क्योंकि कोई भी एक केंद्र किसी वस्तु को तब तक ही देख पाता है, जब तक वह उसके ठीक ऊपर से गुज़र रही हो—यानी, बहुत ही कम समय के लिए.

यह रिपोर्ट सैटेलाइट लॉन्च और मलबे में तेज़ी से हो रही बढ़ोतरी के कारण ऑर्बिट में बढ़ते खतरों की ओर इशारा करती है. वैश्विक डेटा के अनुसार, हाल के वर्षों में लगभग 1,50,000 ‘क्लोज़ अप्रोच अलर्ट’ जारी किए गए हैं. ये अलर्ट ऑपरेटर्स को तब चेतावनी देते हैं, जब दो चीज़ें एक-दूसरे के खतरनाक रूप से करीब आ जाती हैं.

ISRO ने 18 बार टक्कर से बचने के लिए अपनी दिशा बदली (collision avoidance manoeuvres), जिनमें से 14 बार लो अर्थ ऑर्बिट में और चार बार जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में ऐसा किया गया. जिन सैटेलाइट्स को अपना रास्ता बदलना पड़ा, उनमें से एक NASA-ISRO का ‘सिंथेटिक अपर्चर रडार मिशन’ था.

पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद वस्तुएं लगभग 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं. अगर ये वस्तुएं किसी चालू सैटेलाइट से टकरा जाएं, तो इनके छोटे-छोटे टुकड़े भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं. ISRO ने कहा कि अंतरिक्ष में होने वाली गतिविधियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना, सुरक्षित और टिकाऊ अंतरिक्ष अभियानों को सुनिश्चित करने के लिए बेहद ज़रूरी है.

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