Saturday, September 19, 2026

फैटी लिवर सिर्फ लिवर की बीमारी नहीं, दिल और शरीर के दूसरे अंगों पर भी पड़ सकता है असर.

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फैटी लिवर आज तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। विशेषज्ञों के मुताबिक, खराब खान-पान, शारीरिक गतिविधि की कमी, मोटापा, डायबिटीज और अत्यधिक शराब का सेवन इसके प्रमुख जोखिम कारकों में हैं। खासतौर पर मेटाबॉलिक कारणों से होने वाला फैटी लिवर लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के रह सकता है और समय के साथ दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है।

फैटी लिवर में लिवर की कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा वसा जमा हो जाती है। शुरुआती अवस्था में कई लोगों को इसका पता भी नहीं चलता, लेकिन बीमारी बढ़ने पर लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस और कुछ मामलों में सिरोसिस जैसी गंभीर जटिलताएं विकसित हो सकती हैं।

दिल की सेहत पर असर

फैटी लिवर और हृदय संबंधी बीमारियों के बीच मजबूत संबंध देखा गया है। इस स्थिति के साथ मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और असामान्य कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं अक्सर जुड़ी होती हैं। ये सभी हृदय रोग के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।

इसी वजह से फैटी लिवर वाले लोगों में हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक के जोखिम पर भी ध्यान देना जरूरी माना जाता है। हालांकि, केवल फैटी लिवर को इन बीमारियों का अकेला कारण मानना सही नहीं होगा; कई साझा मेटाबॉलिक जोखिम इसमें भूमिका निभाते हैं।

गंभीर अवस्था में दिमाग पर असर

जब लिवर की बीमारी काफी बढ़कर सिरोसिस जैसी अवस्था में पहुंचती है, तो लिवर शरीर से कुछ विषैले पदार्थों को पर्याप्त रूप से साफ नहीं कर पाता। इसके परिणामस्वरूप हेपेटिक एन्सेफेलोपैथी हो सकती है।

इसमें भ्रम, ध्यान लगाने में परेशानी, व्यवहार में बदलाव और बोलने या सोचने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी होता है।

पेट में सूजन और तरल पदार्थ जमा होना

उन्नत लिवर रोग में पेट के अंदर तरल पदार्थ जमा होने की समस्या हो सकती है, जिसे असाइटिस कहा जाता है। इससे पेट का आकार बढ़ सकता है और भारीपन या असहजता महसूस हो सकती है।

यह समस्या आमतौर पर लिवर की गंभीर क्षति और पोर्टल हाइपरटेंशन जैसी जटिलताओं से जुड़ी होती है। पेट में अचानक या लगातार बढ़ती सूजन को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

टाइप-2 डायबिटीज से संबंध

फैटी लिवर और इंसुलिन रेजिस्टेंस के बीच भी गहरा संबंध है। जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, तो ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

इसी कारण फैटी लिवर वाले लोगों में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। दूसरी ओर, डायबिटीज होने पर फैटी लिवर और उससे जुड़ी लिवर की जटिलताओं का खतरा भी बढ़ सकता है।

पैरों में सूजन कब हो सकती है?

पैरों या टखनों में सूजन सामान्य फैटी लिवर की अनिवार्य पहचान नहीं है। हालांकि, जब लिवर की बीमारी गंभीर हो जाती है, तो शरीर में तरल पदार्थ जमा होने के कारण पैरों में सूजन दिखाई दे सकती है।

इसलिए पैरों में लगातार सूजन, पेट फूलना, त्वचा या आंखों का पीला पड़ना, अत्यधिक कमजोरी या भ्रम जैसे लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर दिखने का क्या मतलब है?

अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर दिखाई देने का अर्थ यह नहीं है कि लिवर का कोई निश्चित प्रतिशत हिस्सा वसा से भर गया है। अल्ट्रासाउंड आमतौर पर लिवर में वसा की मौजूदगी का संकेत देता है, लेकिन इससे लिवर में मौजूद वसा का सटीक प्रतिशत निर्धारित नहीं किया जाता।

बीमारी की गंभीरता समझने के लिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार लिवर फंक्शन टेस्ट, ब्लड शुगर और लिपिड प्रोफाइल जैसे परीक्षणों के साथ अन्य जांच की सलाह दे सकते हैं।

क्या सावधानी रखें?

फैटी लिवर का पता चलने पर घबराने के बजाय इसके कारणों और संबंधित जोखिमों की जांच कराना महत्वपूर्ण है। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन बनाए रखना और डायबिटीज, ब्लड प्रेशर व कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना मददगार हो सकता है। शराब का सेवन करने वालों को इसके बारे में डॉक्टर से उचित सलाह लेनी चाहिए।

महत्वपूर्ण: फैटी लिवर कई लोगों में शुरुआती चरण में गंभीर समस्या पैदा नहीं करता, लेकिन कुछ मामलों में यह आगे चलकर गंभीर लिवर रोग का रूप ले सकता है। इसलिए रिपोर्ट में फैटी लिवर आने पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है। यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है और डॉक्टर की व्यक्तिगत सलाह का विकल्प नहीं है।

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