Thursday, October 15, 2026

नवादा के मां दुर्गा मंदिर की अनोखी परंपरा, प्रतिमा बनवाने के लिए 40-50 साल का इंतजार; 2050 तक बुकिंग.

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नवादा, 15 अक्टूबर 2026: बिहार के नवादा जिले में मां दुर्गा का एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु को माता की प्रतिमा बनवाने और पूजा का पूरा खर्च उठाने की परंपरा निभानी पड़ती है। पकरीबरावां प्रखंड के रेवार गांव के रेहड़ी टोला स्थित इस मंदिर में प्रतिमा निर्माण के लिए श्रद्धालुओं को कई दशक तक इंतजार करना पड़ता है। मंदिर समिति के सदस्यों के अनुसार, यहां वर्ष 2045 से 2050 तक के लिए भी अग्रिम बुकिंग हो चुकी है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस मंदिर की परंपरा करीब एक सदी पुरानी है। यहां पूजा-अर्चना के साथ श्रद्धालुओं की मन्नत, परिवारों के संघर्ष और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक आस्था की कहानियां भी जुड़ी हैं।

मन्नत पूरी होने पर प्रतिमा निर्माण की जिम्मेदारी

इस मंदिर की सबसे खास परंपरा यह है कि मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मां दुर्गा की प्रतिमा बनवाने और पूजा-मेला आयोजित करने का पूरा खर्च उठाता है। इसके लिए पहले से नाम दर्ज कराना पड़ता है और अपनी बारी का इंतजार करना होता है।

मंदिर समिति के सदस्य शंभू पांडे के अनुसार, अभी नाम दर्ज कराने वाले श्रद्धालुओं को वर्ष 2045 से 2050 या उसके बाद तक की तारीख मिल रही है। समिति के मुताबिक, वर्ष 2027 में प्रतिमा निर्माण की जिम्मेदारी धोड़ा गांव के विनोद यादव को मिलेगी।

41 साल बाद अर्जुन यादव के परिवार की बारी

वर्ष 2026 की नवरात्रि में प्रतिमा निर्माण, रंग-रोगन और पूजा की जिम्मेदारी रेहड़ी टोला निवासी अर्जुन यादव और उनकी पत्नी मानो देवी निभा रहे हैं। परिवार के अनुसार, यह मन्नत अर्जुन की दिवंगत मां जनक नंदनी ने लगभग 40-41 साल पहले मांगी थी।

परिवार की सदस्य मनीता देवी बताती हैं कि एक समय गोतिया के विवाद के कारण परिवार को गंभीर आर्थिक और सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ा था। हालात ऐसे हो गए थे कि जनक नंदनी को कई वर्षों तक गांव से बाहर रहना पड़ा। इसी कठिन समय में उन्होंने मां दुर्गा से मन्नत मांगी थी।

परिवार के अनुसार, संकट दूर होने, रोजगार मिलने और संपत्ति वापस मिलने पर उन्होंने माता की प्रतिमा बनवाने का संकल्प लिया था।

आर्थिक तंगी के कारण पहले छोड़ना पड़ा था मौका

मनीता देवी के मुताबिक, पहली बार बारी आने पर आर्थिक तंगी के कारण जनक नंदनी पूजा और प्रतिमा निर्माण का खर्च उठाने में सक्षम नहीं थीं। इस वजह से उन्होंने अपना नंबर दूसरे श्रद्धालु को दे दिया।

अब कई दशक बाद परिवार को फिर अवसर मिला है। अर्जुन यादव ने अपनी मां की मन्नत पूरी करने का फैसला किया है। परिवार का कहना है कि वह खेती-किसानी से जुड़ा है और आर्थिक स्थिति सामान्य है, फिर भी माता के प्रति अपने संकल्प को पूरा करना चाहता है।

बेटे की मौत के बाद भी नहीं टूटी आस्था

अर्जुन यादव के परिवार ने बताया कि करीब पांच साल पहले उनके जवान बेटे अवधेश की हत्या हो गई थी। इस दुखद घटना के बावजूद परिवार ने अपनी धार्मिक परंपरा निभाने का फैसला नहीं बदला।

अर्जुन यादव के अनुसार, मन्नत पूरी करने के लिए उन्होंने अपनी दो बीघा जमीन गिरवी रखी है। उन्होंने कहा कि माता के प्रति लिया गया संकल्प पूरा करना उनके लिए महत्वपूर्ण है।

परिवार की यह कहानी मंदिर से जुड़ी आस्था के साथ-साथ आर्थिक कठिनाइयों के बीच निभाई जा रही पारिवारिक जिम्मेदारी को भी सामने लाती है।

मंदिर का इतिहास करीब 100 साल पुराना

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, रेवार गांव के इस मंदिर का इतिहास लगभग एक सदी पुराना है। बताया जाता है कि वर्ष 1923 में निसंतान जमींदार हर्षहाय लाल ने अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद नौ बीघा जमीन दान की थी।

इसके बाद परमेश्वर दयाल ने छोटी-सी झोपड़ीनुमा संरचना में मां दुर्गा की पूजा शुरू की। समय के साथ मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ती गई और श्रद्धालुओं की संख्या में भी इजाफा हुआ।

स्थानीय मान्यता है कि यहां मन्नत पूरी होने के बाद प्रतिमा निर्माण की परंपरा शुरू हुई। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रतिमा निर्माण के लिए नाम दर्ज कराने की व्यवस्था बनाई गई, जो आज भी जारी है।

कर्मा पूजा से शुरू होता है प्रतिमा निर्माण

मंदिर की परंपरा के अनुसार, मां दुर्गा की मिट्टी की प्रतिमा बनाने का काम कर्मा पूजा के दिन से शुरू होता है। लगभग पांच कारीगर 15 से 20 दिनों में प्रतिमा तैयार करते हैं।

नवरात्र की अष्टमी को प्रतिमा स्थापित कर दो दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद विजयादशमी के दिन प्रतिमा का विसर्जन गांव के तालाब में किया जाता है।

हालांकि, स्थानीय परंपरा के अनुसार, प्रतिमा के भीतर का लकड़ी का ढांचा वापस निकालकर मंदिर में सुरक्षित रख लिया जाता है। ग्रामीण वर्षभर इस ढांचे की पूजा करते हैं।

पूजा और मेले पर चार से पांच लाख रुपये तक खर्च

मंदिर समिति के सदस्य शंभू पांडे के अनुसार, महंगाई बढ़ने के कारण अब पूजा और मेले का कुल खर्च लगभग चार से पांच लाख रुपये या उससे अधिक हो सकता है। इस खर्च की जिम्मेदारी उस श्रद्धालु की होती है, जिसकी प्रतिमा निर्माण की बारी आती है।

समिति के मुताबिक, महानवमी के अवसर पर कुछ श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने की खुशी में बकरों की बलि भी देते हैं। स्थानीय लोगों ने इसकी संख्या सैकड़ों से लेकर करीब एक हजार तक बताई है। यह विवरण मंदिर से जुड़े लोगों के बयानों पर आधारित है।

विजयादशमी के अगले दिन एकादशी को ग्रामीणों, पुजारियों और समिति के सदस्यों की बैठक होती है। इसी दौरान पूजा के खर्च का हिसाब-किताब किया जाता है और अगले वर्षों के लिए नए श्रद्धालुओं के नाम दर्ज किए जाते हैं।

बिहार के अलावा दूसरे राज्यों से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु

स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मंदिर में बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि नवरात्र के दौरान कई भक्त मंदिर परिसर में रहकर पूजा-अर्चना करते हैं। गांव की कुछ महिलाएं भी कई दिनों तक मंदिर में रहकर विशेष धार्मिक अनुष्ठान करती हैं।

श्रद्धालु बिरजू प्रसाद ने बताया कि पारिवारिक परेशानियों के समय उन्होंने भी मां दुर्गा की शरण ली थी। उनके अनुसार, अब उनका परिवार पहले से बेहतर स्थिति में है और वे अपनी खुशहाली को माता के आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं।

आस्था, परंपरा और पीढ़ियों से जुड़ा संकल्प

नवादा के रेवार गांव स्थित मां दुर्गा मंदिर की पहचान उसकी लंबी प्रतीक्षा वाली प्रतिमा निर्माण परंपरा से बनी है। यहां श्रद्धालु कई दशकों तक अपनी बारी का इंतजार करते हैं और मनोकामना पूरी होने के बाद पूजा का खर्च उठाने का संकल्प निभाते हैं।

अर्जुन यादव के परिवार की कहानी इस परंपरा का एक उदाहरण है, जिसमें करीब चार दशक पुरानी मन्नत को अगली पीढ़ी पूरा कर रही है। स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर धार्मिक आस्था, सामुदायिक भागीदारी और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

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