Monday, July 27, 2026

टाटा स्टील का बड़ा कदम: जमशेदपुर प्लांट में ₹2,500 करोड़ का निवेश, नई तकनीक से घटेगा कार्बन उत्सर्जन.

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बिजनेस डेस्क: टाटा स्टील ने अपने जमशेदपुर स्टील संयंत्र में पर्यावरण अनुकूल उत्पादन प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए करीब ₹2,500 करोड़ के निवेश की योजना बनाई है। इस परियोजना के तहत कंपनी अत्याधुनिक ईजीमेल्ट (e-GMELT) तकनीक को अपनाएगी, जिसका उद्देश्य इस्पात उत्पादन के दौरान कार्बन उत्सर्जन और कोक की खपत में उल्लेखनीय कमी लाना है।

कंपनी का मानना है कि यह पहल उसके 2045 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

एसएमएस ग्रुप के साथ तकनीकी साझेदारी

परियोजना के लिए टाटा स्टील ने लक्ज़मबर्ग स्थित इंजीनियरिंग कंपनी SMS Group के साथ सहयोग किया है। जमशेदपुर संयंत्र में प्रस्तावित यह परियोजना औद्योगिक स्तर पर इस तकनीक के शुरुआती उपयोगों में से एक मानी जा रही है।

नई तकनीक के लागू होने के बाद ब्लास्ट फर्नेस की कार्यक्षमता बढ़ाने के साथ-साथ पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य रखा गया है।

क्या है ईजीमेल्ट तकनीक?

ईजीमेल्ट (Electrically Assisted Syngas Smelter) ऐसी उन्नत तकनीक है, जो स्टील उत्पादन के दौरान निकलने वाली गैसों का दोबारा उपयोग कर उन्हें ऊर्जा और उपयोगी गैस मिश्रण (सिनगैस) में बदलने का काम करती है।

इस प्रणाली में ड्राई रिफॉर्मिंग, शाफ्ट इंजेक्शन और ट्यूयर इंजेक्शन जैसी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे ब्लास्ट फर्नेस अधिक ऊर्जा दक्ष बनता है और कार्बन आधारित ईंधन की आवश्यकता कम हो जाती है।

कोक की खपत में लगभग 50% कमी का लक्ष्य

कंपनी के अनुसार, इस तकनीक के पूरी तरह लागू होने पर प्रति टन हॉट मेटल उत्पादन के लिए कोक की खपत लगभग 440 किलोग्राम से घटकर 220 किलोग्राम तक आ सकती है। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में भी करीब 50 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है।

मौजूदा संयंत्रों को बनाया जाएगा अधिक पर्यावरण अनुकूल

नई इकाई स्थापित करने के बजाय टाटा स्टील अपने मौजूदा उत्पादन ढांचे में तकनीकी बदलाव (रेट्रोफिटिंग) कर उसे अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर जोर दे रही है। कंपनी का मानना है कि यह तरीका लागत और समय—दोनों की दृष्टि से अधिक प्रभावी है।

यदि जमशेदपुर में यह परियोजना सफल रहती है, तो भविष्य में इसे कंपनी के अन्य ब्लास्ट फर्नेस तक भी विस्तार देने की योजना है। इससे बड़े पैमाने पर हरित इस्पात उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है।

नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में अहम पहल

टाटा स्टील लंबे समय से कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों पर काम कर रही है। कंपनी का कहना है कि आधुनिक तकनीकों को अपनाकर पारंपरिक इस्पात उत्पादन प्रक्रिया को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।

2045 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने की रणनीति के तहत यह निवेश कंपनी की दीर्घकालिक पर्यावरणीय योजनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। साथ ही, उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक अपेक्षित परिणाम देती है, तो भारतीय इस्पात उद्योग में कम-कार्बन उत्पादन मॉडल को नई दिशा मिल सकती है।

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