अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई है। विशेषज्ञों को आशंका है कि यदि तनाव लंबा खिंचा तो पेट्रोल-डीजल से लेकर परिवहन और हवाई यात्रा तक की लागत बढ़ सकती है।
न्यूयॉर्क: मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 101.21 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। जुलाई के बाद यह पहला मौका है जब ब्रेंट ने 100 डॉलर का स्तर पार किया है।
इसी दौरान अमेरिकी बेंचमार्क क्रूड की कीमत भी बढ़कर 96.05 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। तेल की कीमतों में इस तेजी ने दुनिया भर में महंगाई और ईंधन की लागत को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिका-ईरान तनाव से बिगड़ा तेल बाजार का संतुलन
तेल बाजार में तेजी के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव प्रमुख वजह माना जा रहा है। हालिया घटनाक्रम के बाद क्षेत्र में तेल की आपूर्ति और उसके सुरक्षित परिवहन को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में ईरान से जुड़े पांच तेल टैंकर नष्ट किए गए। इसके बाद ईरान समर्थित हूती समूह ने सऊदी अरब के कुछ वैकल्पिक तेल मार्गों और तेल आपूर्ति से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया।
इन घटनाओं के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और अन्य व्यापारिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है और यहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल के गुजरने का अनुमान है।
पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ तो आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
कच्चे तेल की कीमतों का असर सिर्फ ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल और डीजल के महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका प्रभाव रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत बढ़कर 4.22 डॉलर प्रति गैलन हो गई है। यह संघर्ष शुरू होने से पहले के मुकाबले करीब 42 प्रतिशत अधिक बताई जा रही है। वहीं, डीजल का भाव 5.94 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है।
डीजल का इस्तेमाल ट्रकों, माल ढुलाई और कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में इसकी कीमत बढ़ने पर फल-सब्जियों, दवाओं और अन्य जरूरी सामानों की ढुलाई महंगी हो सकती है। कंपनियां बढ़ी हुई परिवहन लागत को ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
हवाई यात्रा भी हो सकती है महंगी
महंगे कच्चे तेल का असर एविएशन सेक्टर पर भी पड़ रहा है। विमानन कंपनियों के खर्च में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक हवाई ईंधन है। कीमत बढ़ने पर एयरलाइंस के परिचालन खर्च में इजाफा होता है।
ऐसे माहौल में कुछ विमानन कंपनियों ने उड़ानों की संख्या कम करने और किराए में बढ़ोतरी जैसे कदम उठाए हैं। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो हवाई यात्रा की लागत पर भी इसका असर जारी रह सकता है।
120 डॉलर तक पहुंच सकता है कच्चा तेल?
विशेषज्ञों की नजर अब इस बात पर है कि अमेरिका-ईरान तनाव कितने समय तक चलता है और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति कब सामान्य होती है।
बैंक ऑफ अमेरिका के अनुमान के मुताबिक, यदि सैन्य तनाव जारी रहता है और होर्मुज मार्ग पर रुकावट बनी रहती है तो कच्चे तेल की कीमत 110 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।
वहीं, अगर मध्य पूर्व में प्रमुख तेल उत्पादन या प्रसंस्करण संयंत्रों को सीधे नुकसान पहुंचता है, तो कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक जाने का जोखिम भी पैदा हो सकता है।
ऐसे परिदृश्य में दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दोहरा दबाव पड़ सकता है—एक तरफ ऊर्जा लागत बढ़ेगी और दूसरी ओर महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। अमेरिका में नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई और आर्थिक सुस्ती का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है।
