नई दिल्ली: धूम्रपान को फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम कारक माना जाता है, लेकिन लंबे समय से वैज्ञानिकों के सामने एक सवाल बना हुआ था—कुछ लोग वर्षों तक धूम्रपान करने के बावजूद इस बीमारी से कैसे बचे रहते हैं, जबकि कुछ ऐसे लोग भी फेफड़ों के कैंसर का शिकार हो जाते हैं जिन्होंने कभी सिगरेट नहीं पी होती। हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि केवल धूम्रपान ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की आनुवंशिक (जेनेटिक) बनावट भी यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि उसके शरीर पर कैंसर पैदा करने वाले तत्वों का कितना असर होगा।
जेनेटिक क्षमता निभा सकती है अहम भूमिका
अध्ययन के अनुसार, कुछ लोगों में डीएनए की मरम्मत (DNA Repair) करने वाला प्राकृतिक तंत्र अधिक प्रभावी होता है। जब सिगरेट के धुएं में मौजूद हानिकारक रसायन फेफड़ों की कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं, तो यह मजबूत रिपेयर सिस्टम उस क्षति को समय रहते ठीक कर सकता है। इससे कैंसर पैदा करने वाले बदलाव (म्यूटेशन) जमा नहीं हो पाते और बीमारी का खतरा कम हो सकता है।
धूम्रपान न करने वालों में भी क्यों हो सकता है कैंसर?
शोध में यह भी संकेत मिले हैं कि कुछ लोगों में जन्मजात रूप से डीएनए रिपेयर क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर हो सकती है। ऐसे मामलों में वायु प्रदूषण, पैसिव स्मोकिंग (दूसरों के धुएं का संपर्क) या रेडॉन जैसी पर्यावरणीय वजहें भी कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। परिणामस्वरूप, धूम्रपान न करने वाले व्यक्ति में भी फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है।
शोध में क्या सामने आया?
वैज्ञानिकों ने अध्ययन के दौरान लगभग 600 ट्यूमर नमूनों का विश्लेषण किया। उनके अनुसार, व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना न केवल कैंसर होने की संभावना को प्रभावित करती है, बल्कि यह भी तय कर सकती है कि ट्यूमर किस प्रकार विकसित होगा और आगे कैसे बढ़ेगा।
भविष्य में व्यक्तिगत इलाज का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन भविष्य में प्रिसिजन मेडिसिन और पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट को मजबूत आधार दे सकता है। यदि किसी व्यक्ति की जेनेटिक प्रोफाइल पहले से पता हो, तो डॉक्टर उसके कैंसर के जोखिम का बेहतर आकलन कर सकते हैं और जरूरत के अनुसार अधिक प्रभावी उपचार रणनीति तैयार कर सकते हैं।
स्क्रीनिंग और रोकथाम की रणनीतियों में हो सकता है बदलाव
शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि आगे के अध्ययनों में भी यही निष्कर्ष सामने आते हैं, तो भविष्य में कैंसर की स्क्रीनिंग और रोकथाम की योजनाओं में व्यक्ति की आनुवंशिक पृष्ठभूमि को भी शामिल किया जा सकता है। इससे उच्च जोखिम वाले लोगों की समय रहते पहचान करने में मदद मिल सकती है।
अभी और शोध की जरूरत
हालांकि यह अध्ययन चिकित्सा विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह शोध अभी शुरुआती चरण में है और इसके कई निष्कर्ष पशु मॉडल पर आधारित हैं। इंसानों पर विस्तृत अध्ययन और क्लीनिकल परीक्षण के बाद ही इन परिणामों की पूरी पुष्टि हो सकेगी।
विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि चाहे किसी की आनुवंशिक क्षमता कैसी भी हो, धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों का प्रमुख जोखिम कारक है। इसलिए तंबाकू और धूम्रपान से दूरी बनाना ही बेहतर स्वास्थ्य के लिए सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।
