पटना: जागरण फिल्म फेस्टिवल के अंतिम दिन पटना का सभागार फिल्मों के साथ भक्ति और भावनाओं से भी सराबोर नजर आया। संत नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ की प्रस्तुति से पहले दर्शकों के बीच जय श्रीराम और जय हनुमान के जयकारे सुनाई दिए। फिल्म के एक प्रसंग में हनुमान चालीसा का पाठ शुरू होते ही दर्शक भी उससे जुड़ गए और सभागार का माहौल भक्तिमय हो गया।
नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म
लेखक और निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी की फिल्म ‘हनुमान अंश’ संत नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा को केंद्र में रखकर बनाई गई है।
कहानी स्वतंत्रता से पहले के भारत की पृष्ठभूमि में आगे बढ़ती है। फिल्म की शुरुआत लक्ष्मी नारायण शर्मा के बचपन से होती है, जो आगे चलकर नीम करोली बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए।
मां के निधन के बाद ईश्वर की खोज
फिल्म में मां के आकस्मिक निधन के बाद बालक लक्ष्मी नारायण के मन में उठने वाले सवालों और उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा को प्रमुखता दी गई है। इसके बाद वह घर से निकलकर उत्तर भारत की ओर आध्यात्मिक यात्रा पर रवाना होता है।
इस दौरान वह कई कठिन परिस्थितियों से गुजरता है और अलग-अलग स्थानों पर आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करता है। धीरे-धीरे उसकी यात्रा वैराग्य और आत्मअनुशासन की दिशा में आगे बढ़ती है।
वैराग्य से सेवा की राह तक
फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह आध्यात्मिक खोज के साथ उनका जुड़ाव मानव सेवा, करुणा और लोगों के प्रति संवेदनशीलता में बदलता गया। यही यात्रा आगे चलकर उन्हें आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्थापित करती है।
वयस्क नीम करोली बाबा का किरदार शोभिना सत्य ने निभाया है। फिल्म में चंदन आनंद, अनिल रस्तोगी और पूर्णिमा तिवारी भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं।
वास्तविक लोकेशन पर हुआ फिल्मांकन
‘हनुमान अंश’ की शूटिंग चित्रकूट के पंजाबी बाबा आश्रम और ब्रज क्षेत्र सहित कुछ वास्तविक स्थानों पर की गई है। फिल्म में बड़े स्तर के वीएफएक्स के बजाय कहानी, स्थानीय भाषाई रंग और भक्तिपूर्ण संगीत को महत्व दिया गया है।
वन्यजीव और पर्यावरण पर सवाल उठाती लघु फिल्म
फेस्टिवल में ईरानी निर्देशक मालेक एघबाली की 14 मिनट की शॉर्ट फिल्म ‘लाइक फ्रेंड लाइक डीर’ भी दिखाई गई। फिल्म मनुष्य और वन्यजीवों के बीच संबंध तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सवालों को सामने रखती है।
3डी तकनीक और ब्लैक एंड व्हाइट शैली में बनी यह फिल्म एक वन्यजीव रेंजर की कहानी के जरिए कर्तव्य, दोस्ती, अपराधबोध और नैतिक दुविधा जैसे विषयों को सामने लाती है। हिरण के सिर वाले एक पात्र के जरिए इंसान और जानवर के बीच की सीमाओं को प्रतीकात्मक रूप से दिखाया गया है।
‘बोध’ में दिखा लॉकडाउन का असर
फिल्म फेस्टिवल का समापन भोजपुरी फिल्म ‘बोध’ की प्रस्तुति के साथ हुआ। लेखक, निर्माता और निर्देशक प्रशांत रंजन की इस फिल्म में कोरोना लॉकडाउन के दौरान लोगों के मानसिक और भावनात्मक अनुभवों को कहानी का आधार बनाया गया है।
फिल्म में बिहार के मध्यमवर्गीय परिवारों के ग्रामीण और शहरी जीवन की झलक देखने को मिलती है। कहानी दो छात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो लॉकडाउन के दौरान एक कमरे तक सीमित हो जाते हैं। परिवार से दूर रहकर सामान्य जीवन बनाए रखने की उनकी कोशिश और कठिन परिस्थितियों में हास्य तलाशने का प्रयास कहानी को मानवीय बनाता है।
‘लिप्पीटिक’ में दिखी अलग पृष्ठभूमि की दोस्ती
फेस्टिवल में 45 मिनट की फिल्म ‘लिप्पीटिक’ भी दर्शकों के सामने आई। इसमें अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से आने वाली दो लड़कियों की दोस्ती को केंद्र में रखा गया है।
गांव की 10 वर्षीय छुटकी और लखनऊ के संपन्न परिवार से आने वाली 23 वर्षीय अंशिका की मुलाकात के बाद दोनों के बीच दोस्ती विकसित होती है। फिल्म के जरिए उनके अनुभवों और एक-दूसरे से सीखने की प्रक्रिया को प्रस्तुत किया गया है।
विविध विषयों वाली फिल्मों से हुआ समापन
फिल्म फेस्टिवल के अंतिम दिन दिखाई गई फिल्मों में आध्यात्मिकता, पर्यावरण, कोरोना काल, सामाजिक परिस्थितियों और मानवीय रिश्तों जैसे अलग-अलग विषय देखने को मिले। ‘हनुमान अंश’ की भक्तिमय प्रस्तुति से शुरू हुई शाम अन्य सामाजिक और मानवीय सरोकारों से जुड़ी फिल्मों के प्रदर्शन के साथ संपन्न हुई।
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