माले: भारत और मालदीव के बीच कूटनीतिक रिश्तों में पिछले कुछ समय से चली आ रही कड़वाहट अब आर्थिक सहयोग की मिठास में बदलती दिख रही है. गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहे मालदीव को भारत ने एक बार फिर संकटमोचक की भूमिका निभाते हुए बड़ा सहारा दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति के तहत भारत ने मालदीव को ‘करेंसी स्वैप’ प्रोग्राम के माध्यम से 30 अरब भारतीय रुपये (₹3000 करोड़) की पहली वित्तीय सहायता देने की औपचारिक मंजूरी दे दी है.
आर्थिक संकट और भारत का हस्तक्षेप
मालदीव वर्तमान में विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी और बाहरी ऋण के दबाव से जूझ रहा है. आयात और पर्यटन पर अत्यधिक निर्भर होने के कारण, मालदीव की अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी मुद्रा की उपलब्धता अनिवार्य है. ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और मालदीव मौद्रिक प्राधिकरण (MMA) के बीच हुआ यह द्विपक्षीय समझौता मालदीव के लिए ऑक्सीजन की तरह काम करेगा. इस सहायता का उद्देश्य मालदीव के अल्पकालिक विदेशी मुद्रा संकट को हल करना और उसकी मुद्रा ‘रुफिया’ की स्थिति को स्थिर करना है.
- करेंसी स्वैप समझौते की बारीकियां
- यह मदद दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क (2024-2027) के तहत प्रदान की गई है. इस बड़े पैकेज के दो हिस्से हैं: पहला, 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 3,300 करोड़ रुपये) और दूसरा, 30 अरब भारतीय रुपये (लगभग 3,000 करोड़ रुपये). भारतीय रुपये की इस किश्त के जरिए मालदीव भारत से सीधे व्यापार करने में सक्षम होगा, जिससे उसे डॉलर पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
मुइज्जू सरकार का रुख
मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू, जिन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत ‘इंडिया आउट’ अभियान के साथ की थी, उनके रुख में अब स्पष्ट बदलाव दिख रहा है. उन्होंने इस वित्तीय मदद को मालदीव की आर्थिक स्थिरता के लिए एक मील का पत्थर बताया है. मुइज्जू सरकार ने भारत के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा है कि यह सहयोग न केवल आर्थिक संकट को दूर करेगा, बल्कि दोनों देशों के बीच पुराने द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा.
भारत द्वारा दी गई यह मदद न केवल मालदीव की डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देगी, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पकड़ को भी मजबूत करेगी.


