Monday, June 22, 2026

भारत ने चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ से आने वाले रबर केमिकल पर पांच साल के लिए एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाई है.

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नई दिल्ली: भारत सरकार ने चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) से आने वाले रबर केमिकल पर पांच साल के लिए एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगा दी है. यह कदम भारतीय उद्योगों को विदेशी कंपनियों की अनुचित प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए उठाया गया है. वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह टैक्स 19 जून 2026 से लागू हो गया है और अगले पांच सालों तक प्रभावी रहेगा.

क्यों लिया गया यह फैसला?
वाणिज्य मंत्रालय की जांच शाखा ‘डायरेक्टरेट जनरल ऑफ ट्रेड रेमेडीज’ (DGTR) ने अपनी जांच में पाया कि चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ की कंपनियां ‘सल्फिनामाइड्स एक्सीलरेटर’ नामक केमिकल को उसकी वास्तविक कीमत से बहुत कम दाम पर भारतीय बाजार में बेच रही थीं. इसे ‘डंपिंग’ कहा जाता है. इस सस्ते आयात के कारण भारत के घरेलू केमिकल निर्माताओं को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा था और वे बाजार में टिक नहीं पा रहे थे.

नया टैक्स और इसका दायरा
सरकार द्वारा लगाया गया यह एंटी-डंपिंग शुल्क 75 डॉलर से लेकर 1,748 डॉलर प्रति टन के बीच है. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि केमिकल किस देश और किस कंपनी से आ रहा है.यह केमिकल मुख्य रूप से ऑटोमोबाइल टायर और रबर उद्योग में इस्तेमाल होता है. इसका काम रबर को मजबूत और टिकाऊ बनाना है.

एल्युमीनियम फॉयल और PET रेजिन पर भी कार्रवाई
सिर्फ केमिकल ही नहीं, सरकार ने दो अन्य महत्वपूर्ण उत्पादों पर भी सख्त कदम उठाए हैं:

PET रेजिन: चीन से आने वाले प्लास्टिक और पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले हाई-क्वालिटी PET रेजिन पर 200.66 डॉलर प्रति टन की ड्यूटी लगाई गई है.

एल्युमीनियम फॉयल: चीन, मलेशिया, थाईलैंड और इंडोनेशिया से आने वाले एल्युमीनियम फॉयल पर पहले से लागू टैक्स को 15 दिसंबर 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया है.

भारतीय बाजार और कंपनियों पर असर
इस फैसले की खबर आते ही भारतीय शेयर बाजार में घरेलू रबर केमिकल बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में भारी उछाल देखा गया. देश की सबसे बड़ी रबर केमिकल कंपनी NOCIL Limited के शेयर लगभग 20% तक बढ़ गए.

इस टैक्स के लगने से अब विदेशी केमिकल भारत में महंगे हो जाएंगे, जिससे भारतीय कंपनियों को समान अवसर मिलेगा. हालांकि, इसका एक असर यह भी हो सकता है कि टायर कंपनियों की उत्पादन लागत थोड़ी बढ़ जाए. यह पूरी प्रक्रिया विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के तहत पूरी पारदर्शिता के साथ की गई है, जिसका उद्देश्य केवल भारतीय व्यापार और रोजगार को सुरक्षित रखना है.

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