Ranchi News, 4 November 2026: झारखंड हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के तीन जूनियर इंजीनियरों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने राज्य सरकार को रॉबिन अजय सिंह, पंकज कुमार और संदीप कुमार को 20 नवंबर 2012 से जूनियर इंजीनियर (मैकेनिकल) के पद से सहायक अभियंता (मैकेनिकल) के पद पर प्रोन्नति देने का आदेश दिया है। साथ ही तीनों को इससे जुड़े सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया है।
जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने तीनों की रिट याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने आदेश की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने के 12 सप्ताह के भीतर औपचारिक आदेश जारी करने को कहा है।
विभाग का प्रमोशन रोकने वाला आदेश निरस्त
हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के सचिव की ओर से 19 जनवरी 2026 को जारी उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें तीनों इंजीनियरों की पिछली तिथि से प्रोन्नति की मांग खारिज कर दी गई थी।
अदालत ने माना कि तीनों इंजीनियर नवंबर 2012 से सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति पाने के योग्य थे। विभाग की देरी के कारण उन्हें वर्षों तक इसका लाभ नहीं मिल सका।
2018 में मिली थी प्रोन्नति, 2012 से लाभ की थी मांग
तीनों याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति 13 नवंबर 2007 को जूनियर इंजीनियर (मैकेनिकल) के पद पर हुई थी। सेवा के दौरान उन्होंने एएमआईई की डिग्री प्राप्त की। नियमानुसार पांच वर्ष की सेवा पूरी करने और रिक्त पद उपलब्ध होने के आधार पर वे नवंबर 2012 से सहायक अभियंता पद पर प्रोन्नति के पात्र हो गए थे।
हालांकि, विभाग ने उन्हें 20 नवंबर 2018 को प्रोन्नति दी। इसके बाद तीनों ने 2012 से प्रोन्नति और उससे जुड़े लाभ देने की मांग की।
इस मामले में हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2025 को विभागीय सचिव को अभिलेखों की जांच कर कारणयुक्त आदेश पारित करने और 16 सप्ताह के भीतर परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद विभाग ने 19 जनवरी 2026 को उनकी मांग खारिज कर दी। इसके बाद तीनों इंजीनियरों ने दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया।
सीबीआई जांच और 2016 की नियमावली का दिया गया था हवाला
विभाग ने प्रोन्नति से इनकार करने के लिए सीबीआई जांच लंबित होने, झारखंड इंजीनियरिंग सेवा नियुक्ति नियमावली 2016 लागू होने तथा झारखंड सेवा संहिता के नियम 58 और झारखंड वित्त नियमावली के नियम 74 का हवाला दिया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोज टंडन ने अदालत में दलील दी कि नवंबर 2012 में उनके खिलाफ न तो प्राथमिकी दर्ज थी, न आरोप पत्र दाखिल हुआ था और न ही विभागीय कार्यवाही में आरोप गठित किए गए थे। ऐसे में केवल प्रारंभिक सीबीआई जांच के आधार पर प्रोन्नति रोकना उचित नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2016 की नियमावली को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि तीनों का प्रोन्नति का अधिकार वर्ष 2012 में ही बन गया था।
विभागीय देरी से कर्मचारियों को नहीं मिल सकता नुकसान
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार के 20 नवंबर 2008 के संकल्प के अनुसार किसी कर्मचारी की प्रोन्नति तभी रोकी जा सकती है, जब वह निलंबित हो, उसके खिलाफ विभागीय कार्यवाही में आरोप गठित हो चुके हों या आपराधिक मामले में आरोप पत्र दाखिल किया गया हो। इस मामले में ऐसी कोई स्थिति नहीं थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2016 की नियमावली को पिछली तिथि से लागू नहीं किया जा सकता। नवंबर 2012 में जब याचिकाकर्ता प्रोन्नति के योग्य हुए थे, तब यह नियमावली अस्तित्व में नहीं थी।
अदालत ने यह भी कहा कि विभाग की अपनी देरी के कारण कर्मचारियों को उनके वैध प्रोन्नति लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। किसी कर्मचारी को प्रोन्नति के लिए विचार किए जाने का मौलिक अधिकार है और इस मामले में याचिकाकर्ताओं के उस अधिकार का उल्लंघन हुआ।
कार्यपालक अभियंता पद पर प्रोन्नति पर भी विचार का निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तीनों इंजीनियरों को 20 नवंबर 2012 से सहायक अभियंता (मैकेनिकल) के पद पर प्रोन्नति देने के साथ सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया है।
इसके अलावा अदालत ने कहा है कि तीनों की कार्यपालक अभियंता (मैकेनिकल) के पद पर प्रोन्नति के मामलों पर भी संबंधित नियमों के अनुसार विचार किया जाए।
