रांची | 30 अक्टूबर 2026
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) की जादूगोड़ा इकाई में कार्यरत महिला कर्मचारी थानुश्री नायक की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है। अदालत ने केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, धनबाद के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बर्खास्तगी को अवैध बताते हुए कर्मचारी को नौकरी पर बहाल करने और पूरा बकाया वेतन सहित अन्य वित्तीय लाभ देने का निर्देश दिया गया था।
न्यायालय ने कहा कि बर्न्ट लाइम की रासायनिक जांच रिपोर्ट में कथित हेरफेर गंभीर कदाचार की श्रेणी में आता है। ऐसे मामले में बर्खास्तगी की सजा को अनुचित या अत्यधिक नहीं माना जा सकता।
जांच रिपोर्ट में हेरफेर का था आरोप
थानुश्री नायक UCIL में साइंटिफिक असिस्टेंट ग्रेड-1 के पद पर कार्यरत थीं। उनकी जिम्मेदारी प्रयोगशाला में बर्न्ट लाइम का रासायनिक विश्लेषण कर रिपोर्ट तैयार करने और उसे सहायक अधीक्षक को भेजने की थी।
मामले के अनुसार, 3 दिसंबर 2007 से 18 अप्रैल 2008 के बीच बर्न्ट लाइम के लगभग 60 से 65 प्रतिशत नमूनों की जांच रिपोर्ट में बदलाव किए जाने का आरोप लगा था। रिपोर्ट में कैल्शियम ऑक्साइड (CaO) की मात्रा वास्तविक परिणामों से अधिक दर्शाए जाने की बात सामने आई थी।
बर्न्ट लाइम की गुणवत्ता के आधार पर सप्लायर को भुगतान किया जाता था। आरोप था कि रिपोर्ट में बदलाव से खराब गुणवत्ता वाला बर्न्ट लाइम आपूर्ति करने वाले मेसर्स श्याम केमिकल्स को अनुचित आर्थिक लाभ मिला और कंपनी को नुकसान हुआ।
शुरुआती जवाब में गलती मानने, बाद में आरोप नकारने की बात
अदालत के समक्ष रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार, 28 अप्रैल 2008 को स्पष्टीकरण मांगे जाने पर कर्मचारी ने अपने जवाब में जांच परिणामों में बदलाव करने की बात स्वीकार करते हुए माफी मांगी थी। उसने अपने पूर्व सेवा रिकॉर्ड का हवाला देते हुए राहत देने का अनुरोध किया था।
2 मई 2008 के एक अन्य पत्र में उसने कथित तौर पर कहा था कि सप्लायर ने व्यक्तिगत रूप से मिलकर जांच परिणाम अधिक दिखाने का अनुरोध किया था।
हालांकि, आरोप पत्र जारी होने के बाद 19 मई 2008 को दिए गए जवाब में कर्मचारी ने आरोपों से इनकार किया। उसने दावा किया कि सहायक अधीक्षक ने दबाव डालकर उससे पहले के पत्र लिखवाए थे। विभागीय जांच में इस दलील को स्वीकार नहीं किया गया।
जांच अधिकारी ने दस्तावेजों और गवाहों के बयानों के आधार पर छह आरोपों को प्रमाणित माना। इसके बाद अनुशासनिक प्राधिकार ने कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त कर दिया। अपीलीय प्राधिकार ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
श्रम न्यायाधिकरण ने बहाली का दिया था आदेश
महिला कर्मचारी ने बर्खास्तगी के खिलाफ औद्योगिक विवाद उठाया था। केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, धनबाद ने 6 मार्च 2014 को विभागीय जांच को निष्पक्ष और उचित माना था।
इसके बावजूद 21 जनवरी 2015 के अपने फैसले में न्यायाधिकरण ने बर्खास्तगी रद्द कर दी। उसका मानना था कि कर्मचारी के शुरुआती दोनों पत्र दबाव में लिखवाए गए प्रतीत होते हैं और कंपनी को हुए वास्तविक नुकसान का ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
न्यायाधिकरण ने छहों आरोपों को अप्रमाणित मानते हुए कर्मचारी को सेवा में बहाल करने तथा पूरा बकाया वेतन और अन्य वित्तीय लाभ देने का आदेश दिया था। UCIL ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के मूल्यांकन पर उठाए सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि जब न्यायाधिकरण विभागीय जांच को निष्पक्ष और उचित मान चुका था, तब जांच अधिकारी के निष्कर्षों को खारिज करने के लिए ठोस कारण देना जरूरी था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 11-ए के तहत न्यायाधिकरण को विभागीय जांच में पेश साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करने का अधिकार है। हालांकि, इस अधिकार का इस्तेमाल न्यायिक विवेक के साथ किया जाना चाहिए। जांच अधिकारी के निष्कर्षों में स्पष्ट त्रुटि होने या सजा अत्यधिक असंगत होने पर ही हस्तक्षेप उचित है।
हाईकोर्ट के अनुसार, इस मामले में जांच अधिकारी के निष्कर्ष दस्तावेजों और गवाहों के बयानों पर आधारित थे। इसलिए न्यायाधिकरण द्वारा उन निष्कर्षों को खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं था।
UCIL का बर्खास्तगी आदेश फिर प्रभावी
हाईकोर्ट ने श्रम न्यायाधिकरण के 21 जनवरी 2015 के आदेश को रद्द करते हुए UCIL की ओर से जारी बर्खास्तगी के फैसले को बहाल कर दिया। इसके साथ ही कंपनी की रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
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