रांची: विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU) में शनिवार को आदिवासी भाषा, साहित्य और संस्कृति को लेकर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग और एसटी/एससी सेल ने संयुक्त रूप से किया।
कार्यक्रम का मुख्य विषय “आदिवासी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति: संरक्षण, चुनौतियां एवं संभावनाएं” रहा। वक्ताओं ने आदिवासी समाज की परंपराओं, मौखिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
आधुनिक तकनीक के साथ जड़ों से जुड़े रहना जरूरी
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजीव मनोहर ने कहा कि आदिवासी समाज की जीवन शैली और साहित्य की परंपरा काफी समृद्ध रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में विज्ञान और तकनीक से दूरी बनाकर रहना संभव नहीं है, लेकिन आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने आदिवासी समाज की श्रम संस्कृति और सामुदायिक जीवन पद्धति को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर रहना आदिवासी जीवन दर्शन की प्रमुख विशेषता है। प्रकृति पर वर्चस्व स्थापित करने के बजाय उसके साथ सामंजस्य बनाना समाज के लिए महत्वपूर्ण संदेश है।
आदिवासी समुदायों की विविधता पर चर्चा
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं पूर्व कुलपति प्रो. सत्यनारायण मुंडा ने दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों की विविधता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विभिन्न जनजातीय समूहों की पहचान उनकी भाषा, परंपरा, संस्कृति, भौगोलिक परिस्थितियों और सामाजिक जीवन से जुड़ी है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों के पास पीढ़ियों से चली आ रही कई मौलिक परंपराएं और ज्ञान मौजूद हैं। ऐसे ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की जरूरत है।
पारंपरिक ज्ञान को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित करने पर जोर
एसटी/एससी सेल के प्रभारी डॉ. जिन्दर सिंह मुंडा ने कहा कि मौजूदा समय में आदिवासी समाज और उसकी परंपराओं का महत्व और बढ़ गया है। उन्होंने पारंपरिक खान-पान, खेल, औषधीय ज्ञान और जीवन शैली को मानव समाज के लिए उपयोगी बताया।
टीआरएल के समन्वयक डॉ. विनोद कुमार ने कहा कि आदिवासी भाषाओं और साहित्य में मौखिक रूप से बड़ी मात्रा में ज्ञान मौजूद है। इस ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए उसका दस्तावेजीकरण और लिपिबद्ध करना जरूरी है।
विद्यार्थियों ने भी निभाई अहम भूमिका
कार्यक्रम का संचालन डॉ. डुमनी माय मुर्मू ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. जय किशोर मंगल ने दिया। आयोजन को सफल बनाने में एसटी/एससी सेल के सदस्य डॉ. विजय कुमार, डॉ. मालती वागीशा लकड़ा, डॉ. सेलेस्टीन सोरेंग, निताई और संजय सहित हिंदी तथा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विद्यार्थियों की भूमिका रही।
व्याख्यान के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि आदिवासी भाषाओं, साहित्य, परंपराओं और सांस्कृतिक ज्ञान के संरक्षण के लिए शैक्षणिक संस्थानों में निरंतर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
