रांची: झारखंड में उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा हासिल है, लेकिन सरकारी स्कूलों में इसकी पढ़ाई के लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। वर्षों से बड़ी संख्या में पद रिक्त रहने के कारण उर्दू शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में रांची जिले के स्कूलों में शिक्षकों की कमी की तस्वीर सामने आई है।
स्वीकृत पदों के मुकाबले बड़ी संख्या में रिक्तियां
रांची जिले के 227 राजकीय और राज्यकृत विद्यालयों से आरटीआई के जरिए जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, उर्दू शिक्षकों के कई पद लंबे समय से खाली हैं। नियुक्ति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने का असर सीधे विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
रांची प्रखंड के दो दर्जन से अधिक विद्यालयों में उर्दू शिक्षकों के कुल 56 पद स्वीकृत हैं। इनमें से सिर्फ 22 शिक्षक कार्यरत हैं, जबकि 34 पद खाली पड़े हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन स्कूलों में उर्दू विषय की पढ़ाई किस तरह संचालित हो रही है।
हिंदपीढ़ी उर्दू स्कूल में 425 विद्यार्थी, चार शिक्षक पद खाली
जीएमएस हिंदपीढ़ी उर्दू स्कूल में उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या करीब 425 है। स्कूल में उर्दू शिक्षकों के लिए कुल 7 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें केवल 3 शिक्षक कार्यरत हैं। यानी यहां भी 4 पद रिक्त हैं।
छात्रों की संख्या और शिक्षकों की उपलब्धता के बीच इस अंतर का असर प्राथमिक स्तर पर उर्दू की पढ़ाई पर पड़ना स्वाभाविक है। लंबे समय से पद खाली रहने के कारण विद्यार्थियों को पर्याप्त शैक्षणिक सहयोग नहीं मिल पा रहा है।
नियुक्ति में देरी से बढ़ रही समस्या
झारखंड गठन के करीब 26 वर्ष बाद भी उर्दू शिक्षा से जुड़ी बुनियादी समस्याओं का पूरी तरह समाधान नहीं हो पाया है। सरकारी स्कूलों में उर्दू शिक्षकों के सैकड़ों पद रिक्त बताए जा रहे हैं और नियुक्ति प्रक्रियाएं लंबे समय से लंबित हैं।
जनवादी लेखक संघ से जुड़े एमजेड खान का कहना है कि उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने के बाद उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन की दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है।
उर्दू शिक्षा को मजबूत करने के लिए उठाए जा सकते हैं कदम
उर्दू शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए उर्दू अकादमी की स्थापना, जिलों में उर्दू प्रकोष्ठ बनाने, खाली शिक्षक पदों पर नियुक्ति, अनुवाद केंद्र स्थापित करने और उर्दू पुस्तकालयों को मजबूत करने जैसे कदमों पर जोर दिया जा सकता है।
शिक्षकों की कमी दूर होने से स्कूलों में उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों को नियमित और बेहतर शैक्षणिक सुविधा उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
