नई दिल्ली: BRICS देशों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अधिक संतुलित और नियम आधारित बनाने की जरूरत पर जोर दिया है। समूह के हालिया घोषणापत्र में किसी देश का सीधे नाम लिए बिना एकतरफा व्यापार प्रतिबंधों, आर्थिक पाबंदियों और संरक्षणवादी नीतियों पर चिंता जताई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, घोषणापत्र में उठाए गए कई मुद्दे अमेरिका और यूरोपीय संघ की मौजूदा व्यापार नीतियों से जुड़े नजर आते हैं।
वैश्विक व्यापार से जुड़े मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, दस्तावेज में WTO सुधार, टैरिफ, सप्लाई चेन, पर्यावरण से जुड़े व्यापार नियम और कृषि क्षेत्र में असमान प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई है। साथ ही BRICS देशों के बीच व्यापार और वित्तीय सहयोग को बढ़ाने की दिशा में भी संकेत दिए गए हैं।
WTO व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर
घोषणापत्र में बहुपक्षीय और नियम आधारित व्यापार व्यवस्था के प्रति समर्थन दोहराया गया है। इसमें विश्व व्यापार संगठन यानी WTO की विवाद निपटान व्यवस्था को प्रभावी बनाने की जरूरत बताई गई है।
BRICS का मानना है कि वैश्विक व्यापार विवादों के समाधान के लिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिसमें सभी देशों को समान अवसर मिले। WTO के अपीलीय तंत्र के लंबे समय से प्रभावित होने को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में चिंता रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि WTO की विवाद समाधान प्रणाली को फिर से प्रभावी बनाने की मांग का असर खासतौर पर उन व्यापारिक नीतियों पर पड़ सकता है, जिन्हें दूसरे देश एकतरफा कदम मानते हैं।
पर्यावरणीय नियमों के नाम पर व्यापार बाधाओं पर आपत्ति
घोषणापत्र में पर्यावरण और जलवायु नीतियों को व्यापार प्रतिबंधों के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किए जाने की संभावना पर भी चिंता जताई गई है।
इस चर्चा का संबंध यूरोपीय संघ के Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) जैसे उपायों से जोड़ा जा रहा है। CBAM का उद्देश्य कुछ अधिक कार्बन-उत्सर्जन वाले आयातित उत्पादों पर उनकी कार्बन लागत के अनुरूप शुल्क लागू करना है।
BRICS देशों की चिंता यह है कि इस तरह की व्यवस्थाओं का असर विकासशील देशों के निर्यातकों पर असमान रूप से पड़ सकता है। खासकर स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में अतिरिक्त लागत बढ़ने से निर्यात प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका जताई जाती है।
विकासशील देशों का तर्क रहा है कि जलवायु संबंधी व्यापार नियम बनाते समय उनकी आर्थिक परिस्थितियों और विकास संबंधी जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
एकतरफा प्रतिबंधों पर भी सवाल
BRICS घोषणापत्र में एकतरफा और दूसरे देशों पर अप्रत्यक्ष रूप से लागू किए जाने वाले आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर भी विरोध दर्ज कराया गया है।
समूह की आपत्ति का व्यापक संदर्भ उन प्रतिबंधात्मक नीतियों से जुड़ा माना जा रहा है, जिनका इस्तेमाल देशों या कंपनियों पर उनके अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों के कारण दबाव बनाने के लिए किया जाता है।
BRICS का जोर इस बात पर है कि आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून तथा बहुपक्षीय संस्थाओं के सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए। इस मुद्दे का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि हाल के वर्षों में प्रतिबंध वैश्विक व्यापार और भुगतान व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए हैं।
कृषि व्यापार में समान अवसर की मांग
घोषणापत्र में कृषि व्यापार को भी प्रमुखता दी गई है। BRICS देशों ने ऐसी वैश्विक व्यापार व्यवस्था की आवश्यकता बताई है, जिसमें विकासशील देशों के किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा का बेहतर माहौल तैयार हो।
विकसित देशों में कृषि क्षेत्र को मिलने वाली बड़ी सरकारी सहायता लंबे समय से विवाद का विषय रही है। विकासशील देशों का कहना है कि भारी सब्सिडी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है।
इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा से जुड़े सरकारी कार्यक्रमों को लेकर भी विकासशील देशों की अपनी चिंताएं हैं। वे चाहते हैं कि किसानों को समर्थन देने और गरीब आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपायों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के साथ बेहतर तरीके से संतुलित किया जाए।
डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश
BRICS के आर्थिक एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना भी है।
इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना और सदस्य देशों के बीच भुगतान व्यवस्था को अधिक सुविधाजनक बनाना है।
हालांकि, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना और एक पूरी तरह वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था तैयार करना दो अलग-अलग बातें हैं। BRICS के लिए फिलहाल व्यावहारिक चुनौती यह है कि अलग-अलग देशों की मुद्राओं, वित्तीय प्रणालियों और भुगतान ढांचे को किस तरह अधिक प्रभावी तरीके से जोड़ा जाए।
सीमा-पार भुगतान और सप्लाई चेन पर फोकस
घोषणापत्र में सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को अधिक तेज, सुरक्षित और कम लागत वाला बनाने पर भी जोर दिया गया है।
BRICS देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। महामारी, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक प्रतिबंधों के बाद कई देशों ने जरूरी वस्तुओं और औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति को लेकर अपनी निर्भरता पर दोबारा विचार किया है।
ऐसे में BRICS के भीतर मजबूत सप्लाई चेन विकसित करने को आर्थिक सुरक्षा के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या BRICS पश्चिमी व्यापार व्यवस्था का विकल्प बनाना चाहता है?
घोषणापत्र को पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था के सीधे विकल्प के रूप में देखना फिलहाल जल्दबाजी होगी। हालांकि, दस्तावेज में जिन मुद्दों पर जोर दिया गया है, उनसे यह जरूर संकेत मिलता है कि BRICS देश वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका बढ़ाना चाहते हैं।
समूह की चुनौती यह होगी कि घोषणापत्र में व्यक्त राजनीतिक सहमति को वास्तविक आर्थिक सहयोग में कैसे बदला जाए। अलग-अलग BRICS देशों के आर्थिक हित, व्यापार संरचना और वैश्विक साझेदारियां काफी अलग हैं।
फिर भी WTO सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर साझा रुख BRICS को वैश्विक आर्थिक बहस में एक महत्वपूर्ण मंच बना रहा है।
कुल मिलाकर, नई दिल्ली घोषणापत्र का संदेश यह है कि BRICS अधिक बहुपक्षीय, संतुलित और विकासशील देशों के हितों को ध्यान में रखने वाली वैश्विक व्यापार व्यवस्था चाहता है। बिना किसी देश का नाम लिए व्यापार प्रतिबंधों, संरक्षणवाद और असमान नियमों की आलोचना करके समूह ने यह संकेत जरूर दिया है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की उसकी मांग अब अधिक स्पष्ट होती जा रही है।
