Friday, September 11, 2026

BRICS Business Forum: भारत ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और निर्यात मजबूत करने पर दिया जोर.

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नई दिल्ली: BRICS बिजनेस फोरम 2026 में भारत ने सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ाने, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को प्रोत्साहित करने और अमेरिकी डॉलर जैसी अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं पर निर्भरता घटाने की जरूरत पर जोर दिया। भारत की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब समूह के साथ देश का व्यापार तेजी से बढ़ा है, लेकिन आयात की रफ्तार निर्यात के मुकाबले कहीं अधिक रही है।

फोरम के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने BRICS देशों से आपसी व्यापार और आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाई देने की अपील की। उन्होंने रणनीतिक खनिजों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भविष्य की तकनीकों जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता भी बताई।

व्यापार में बढ़ता असंतुलन भारत की बड़ी चिंता

भारत और BRICS देशों के बीच व्यापार पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है, लेकिन इसके साथ व्यापार घाटा भी तेजी से बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 में BRICS देशों को भारत का निर्यात करीब 64.3 अरब डॉलर था, जो 2025-26 में बढ़कर 95.7 अरब डॉलर हो गया।

इसके मुकाबले BRICS देशों से भारत का आयात इसी अवधि में 138.8 अरब डॉलर से बढ़कर 321.8 अरब डॉलर पहुंच गया। परिणामस्वरूप कुल व्यापार घाटा 74.5 अरब डॉलर से बढ़कर 226.1 अरब डॉलर हो गया।

भारत का BRICS व्यापार2020-212025-26
BRICS को निर्यात64.3 अरब डॉलर95.7 अरब डॉलर
BRICS से आयात138.8 अरब डॉलर321.8 अरब डॉलर
कुल व्यापार203.1 अरब डॉलर417.5 अरब डॉलर
व्यापार घाटा74.5 अरब डॉलर226.1 अरब डॉलर

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत के लिए केवल व्यापार का आकार बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। निर्यात और आयात के बीच संतुलन बनाना भी बड़ी प्राथमिकता बन गया है।

चीन, रूस और UAE के साथ सबसे बड़ा दबाव

भारत के BRICS व्यापार का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा देशों के साथ केंद्रित है। चीन, रूस और संयुक्त अरब अमीरात के साथ व्यापार भारत के लिए विशेष महत्व रखता है और इन्हीं देशों के साथ बड़े व्यापार घाटे का दबाव भी दिखाई देता है।

वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा सबसे अधिक है। इसके बाद रूस, UAE और सऊदी अरब का स्थान आता है।

देशव्यापार घाटा
चीन9,92,257.73 करोड़ रुपये
रूस4,47,518.05 करोड़ रुपये
UAE2,33,586.09 करोड़ रुपये
सऊदी अरब1,81,240.11 करोड़ रुपये

चीन से आयात कम करना आसान नहीं

भारत के लिए सबसे जटिल चुनौती चीन के साथ व्यापार संतुलन सुधारने की है। चीन से भारत को इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी, दूरसंचार उपकरण, सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरण, बैटरी के हिस्से, रसायन, उर्वरक और विभिन्न औद्योगिक उत्पाद मिलते हैं।

इनमें से कई वस्तुएं भारत के विनिर्माण और बुनियादी ढांचे के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में चीन से आयात को अचानक बड़े स्तर पर कम करना आसान नहीं होगा।

भारत की रणनीति इसलिए आयात घटाने के साथ-साथ घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत विकसित करने पर भी केंद्रित हो सकती है।

रूस से बढ़ा तेल आयात

रूस के साथ भारत के व्यापार में ऊर्जा क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। रूस से होने वाले भारतीय आयात में कच्चे तेल की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में हालिया घटनाक्रमों के बीच रूस से तेल खरीद में बढ़ोतरी ने दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन को और प्रभावित किया है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करते हुए व्यापार घाटे को भी नियंत्रित किया जाए।

UAE और सऊदी अरब के साथ भी आयात भारी

UAE भारत के लिए व्यापार, लॉजिस्टिक्स और पुनः-निर्यात का महत्वपूर्ण केंद्र है। सोना, चांदी और अन्य कीमती धातुओं सहित कई वस्तुओं का आयात UAE के माध्यम से होता है, जिससे दोनों देशों के व्यापार आंकड़ों पर असर पड़ता है।

सऊदी अरब के साथ भारत का व्यापार मुख्य रूप से ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल उत्पादों से प्रभावित होता है। तेल आयात की बड़ी मात्रा व्यापार घाटे का प्रमुख कारण है।

स्थानीय मुद्रा में व्यापार पर जोर

BRICS बिजनेस फोरम में भारत ने स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में भी जोर दिया। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राओं पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और सदस्य देशों के बीच भुगतान व्यवस्था को अधिक लचीला बनाना है।

पीयूष गोयल ने भारत की UPI प्रणाली का उदाहरण देते हुए कहा कि डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भारत का अनुभव BRICS देशों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ाने में उपयोगी हो सकता है।

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से सदस्य देशों को विदेशी मुद्रा संबंधी कुछ जोखिमों को कम करने और आपसी भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि इसके लिए मजबूत वित्तीय ढांचे और देशों के बीच व्यापक सहमति की जरूरत होगी।

भारत ने अपने बाजार और टेक्नोलॉजी क्षमता को बताया ताकत

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी BRICS देशों के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने भारत के बड़े घरेलू बाजार, बढ़ती विनिर्माण क्षमता, तकनीकी अनुभव, कुशल मानव संसाधन और स्टार्टअप एवं नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को देश की प्रमुख ताकतों के रूप में सामने रखा।

भारत की कोशिश है कि BRICS के सदस्य और साझेदार देश भारतीय उत्पादों और तकनीकी समाधानों के लिए अधिक बाजार उपलब्ध कराएं। इससे निर्यात बढ़ाने के साथ घरेलू विनिर्माण को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।

BRICS का बढ़ता दायरा

BRICS के विस्तार के साथ समूह अब पहले की तुलना में काफी बड़ा आर्थिक मंच बन चुका है। मौजूदा प्रमुख सदस्यों में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और UAE शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम जैसे देशों को पार्टनर कंट्री के रूप में जोड़ा गया है।

भारत के लिए समूह का बढ़ता आकार एक अवसर भी है। यदि भारतीय कंपनियां इन बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाती हैं, तो इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी, डिजिटल सेवाओं और अन्य विनिर्मित उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

भारत के सामने अब असली चुनौती

BRICS देशों के बीच आपसी व्यापार बढ़ाना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब चीन समूह की अर्थव्यवस्था में बेहद प्रभावशाली भूमिका रखता है। कई BRICS सदस्य चीन के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार करते हैं और उनके लिए चीन एक महत्वपूर्ण बाजार तथा आपूर्ति स्रोत दोनों है।

भारत के लिए इसलिए केवल स्थानीय मुद्रा में भुगतान व्यवस्था बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उसे अपने उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने, निर्यात बाजारों का विस्तार करने और BRICS देशों में भारतीय कंपनियों की पहुंच मजबूत करने पर भी ध्यान देना होगा।

BRICS बिजनेस फोरम में भारत का संदेश इसी व्यापक रणनीति की ओर इशारा करता है—व्यापार बढ़े, लेकिन वह अधिक संतुलित हो; डॉलर पर निर्भरता घटे, लेकिन भुगतान व्यवस्था मजबूत बने; और BRICS के विस्तार का लाभ भारतीय विनिर्माण व निर्यात को भी मिले।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान इन प्रस्तावों को किस तरह के ठोस आर्थिक फैसलों और व्यावसायिक समझौतों में बदला जाता है।

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