Saturday, May 16, 2026

नौकरियों के संकट और बढ़ती महंगाई के बीच भारत गिग इकोनॉमी की तरफ बढ़ रहा है.

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नई दिल्ली: भारतीय मध्यवर्ग आज एक अभूतपूर्व आर्थिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ बढ़ती महंगाई और महंगे ईंधन ने घरेलू बजट बिगाड़ दिया है, वहीं दूसरी तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन के कारण पारंपरिक कॉर्पोरेट नौकरियों का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है. इस अनिश्चितता के बीच, लोग तेजी से शेयर बाजार, खासकर फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) की तरफ आकर्षित हो रहे हैं.

इन सभी ज्वलंत मुद्दों, मध्यवर्ग के संकट और नए आर्थिक अवसरों पर ETV भारत ने देश के दिग्गज फंड मैनेजर और मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स (Marcellus Investment Managers) के फाउंडर व सीआईओ सौरभ मुखर्जी से उनकी हालिया किताब ‘ब्रेकपॉइंट’ के संदर्भ में विशेष बातचीत की.

प्रश्न: पेट्रोल-डीजल की कीमतों में फिर से बढ़ोतरी हुई है. देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए क्या यह कदम जरूरी था? आप इसे कैसे देखते हैं?

सौरभ मुखर्जी: देखिए, पिछले 3-4 महीनों से सरकार ने सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) के जरिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ खुद संभाला हुआ था. लेकिन सच्चाई यह है कि पिछले एक साल में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें रुपये के संदर्भ में लगभग दोगुनी हो चुकी हैं. इसलिए हालिया ₹3-4 की बढ़ोतरी तो महज एक शुरुआत है. अगर खाड़ी देशों और ईरान के बीच भू-राजनीतिक तनाव इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले समय में ईंधन की कीमतें और तेजी से बढ़ेंगी.

ईंधन के अलावा तीन और बड़े मोर्चे हैं जहां से महंगाई का भारी दबाव बन रहा है. पहला, वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों की कीमतें बीते छह महीनों में करीब 50 फीसदी उछल चुकी हैं. दूसरा, डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया करीब 12% कमजोर हुआ है, जिससे हर तरह का आयात महंगा हो जाएगा. तीसरा, अल नीनो के प्रभाव के कारण कमजोर मानसून की आशंका है, जिससे जुलाई-अगस्त के दौरान खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू सकती हैं. कुल मिलाकर, खुदरा महंगाई (CPI) दिवाली तक 7 से 8 प्रतिशत का स्तर छू सकती है. आरबीआई भी ब्याज दरें बढ़ाने का संकेत दे चुका है. मिडिल क्लास के लिए आने वाले दिन काफी चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं.

प्रश्न: अपनी किताब ‘ब्रेकपॉइंट’ में आपने मध्यवर्ग पर बढ़ते भारी दबाव का जिक्र किया है. इस कठिन परिस्थिति में आम परिवारों के पास क्या विकल्प बचते हैं?

सौरभ मुखर्जी: हमने अपनी किताब में डेटा के साथ इस बात को साबित किया है कि पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर पारंपरिक ‘व्हाइट-कॉलर’ नौकरियों की क्रिएशन बेहद कमजोर हुई है. बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और आईटी (IT) जैसे बड़े सेक्टरों में टेक्नोलॉजी इंसानों की जगह ले रही है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि महंगाई को एडजस्ट करने के बाद, पिछले एक दशक में वास्तविक वेतन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है.

इस वजह से आम लोगों की क्रय शक्ति घटी है और वे अपनी जीवनशैली को बनाए रखने के लिए कर्ज के जाल में फंस रहे हैं. आज होम लोन को छोड़कर, भारतीय मध्यवर्ग का ‘डेट-टू-इनकम’ रेशियो 32 से 33 फीसदी तक पहुंच चुका है, जबकि अधिकांश बड़े देशों में यह आंकड़ा 20% से नीचे रहता है. लोग रोजमर्रा के खर्चों और लाइफस्टाइल के लिए मल्टीपल पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसका सीधा असर खपत पर दिख रहा है. यही वजह है कि आज कंपनियां 4-5% की वॉल्यूम ग्रोथ पर भी जश्न मना रही हैं. कमजोर हायरिंग के कारण बेंगलुरु, गुरुग्राम और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों का रियल एस्टेट मार्केट भी तनाव में है.

प्रश्न: आज भी पैरेंट्स यही मानते हैं कि अच्छे मार्क्स और नामी कॉलेजों की डिग्रियां एक सुरक्षित भविष्य की गारंटी हैं. क्या इस सोच में कोई बदलाव आया है?

सौरभ मुखर्जी: हमारी किताब का मुख्य तर्क यही है कि फेलियर छात्रों का नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का हुआ है. हमने स्कूलों की पढ़ाई को छोड़कर पूरा ध्यान आईआईटी-जेईई या नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं पर केंद्रित कर दिया. लेकिन आज स्थिति यह है कि हमारे देश में लगभग 30% से 40% ग्रेजुएट्स बेरोजगार हैं. जो नौकरियां मिल भी रही हैं, उनके सैलरी पैकेज बेहद निराशाजनक हैं.

डिग्रियों का महत्व अब तेजी से घट रहा है. भारत के सबसे सफल बिजनेस प्रमोटर्स को देखें, तो वे किसी नामी एलीट कॉलेज से नहीं निकले थे; उन्होंने अनुशासन, लगातार सीखने की ललक और दृढ़ता से अपने साम्राज्य खड़े किए. आज के युवा इस बदलाव को समझ रहे हैं. वे कॉलेज के दौरान ही अपनी कंपनियां शुरू कर रहे हैं. देश में हर साल करीब 10 लाख नई कंपनियां रजिस्टर्ड हो रही हैं. हम ‘जॉब सीकर’ से ‘जॉब क्रिएटर’ बनने की तरफ बढ़ रहे हैं.

प्रश्न: आप कह रहे हैं कि देश ‘गिग इकोनॉमी’ (फ्रीलांसिंग) की तरफ बढ़ रहा है. लेकिन इस मॉडल में नियमित आय की कोई सुरक्षा नहीं होती. लोग इस अनिश्चितता से कैसे निपटें?

सौरभ मुखर्जी: कोविड के बाद वर्क फ्रॉम होम (WFH) और रिमोट वर्किंग एक स्थायी वास्तविकता बन चुके हैं. एआई (AI) के आने के बाद रिसर्च, एआई ट्रेनिंग, कोडिंग और मीडिया प्रोडक्शन जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्र फ्रीलांसरों की मांग तेजी से बढ़ी है. अगले दशक में भारत में 10 करोड़ व्हाइट-कॉलर गिग जॉब्स पैदा होने का अनुमान है.

आय की अनिश्चितता निश्चित रूप से एक चुनौती है, लेकिन आज के दौर में रेगुलर सैलरी वाली नौकरियां भी सुरक्षित नहीं हैं. इसलिए परिवारों को अपनी वित्तीय योजना बदलनी होगी. हर परिवार के पास कम से कम 2 साल के घरेलू खर्च के बराबर की नकदी सुरक्षित होनी चाहिए. इसके अलावा, कॉर्पोरेट कवर पर निर्भर रहने के बजाय खुद का पर्सनल हेल्थ और टर्म लाइफ इंश्योरेंस लेना अनिवार्य है. एक बड़ा फायदा यह है कि इस मॉडल में आप महंगे महानगरों को छोड़कर चंडीगढ़, जयपुर, नागपुर या कोयंबटूर जैसे टियर-2/3 शहरों में शिफ्ट हो सकते हैं. इससे रहने की लागत आधी हो जाती है और आर्थिक स्थिरता बढ़ती है.

प्रश्न: मिडिल क्लास के बीच इन दिनों शेयर बाजार, विशेषकर फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) ट्रेडिंग को लेकर भारी क्रेज देखा जा रहा है. क्या यह ट्रेंड सही है?

सौरभ मुखर्जी: बिल्कुल नहीं, बल्कि यह ट्रेंड मध्यवर्ग के लिए बेहद खतरनाक रूप ले चुका है. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने एक ऐसा भ्रम पैदा कर दिया है कि ट्रेडिंग के जरिए रातों-रात अमीर बना जा सकता है. लेकिन सेबी (SEBI) का आधिकारिक डेटा बताता है कि रिटेल निवेशक F&O ट्रेडिंग में हर साल ₹1.1 लाख करोड़ से ₹1.2 लाख करोड़ गंवा रहे हैं. यह आम जनता की मेहनत की गाढ़ी कमाई है जो बर्बाद हो रही है. इस मार्केट पर दुनिया के सबसे बड़े हेज फंड्स का नियंत्रण है, जो सुपर-कंप्यूटर्स और एडवांस एल्गोरिदम से काम करते हैं. एक आम रिटेल निवेशक के लिए इस खेल में जीतना लगभग असंभव है.

प्रश्न: तो क्या आम निवेशकों को शेयर बाजार (Equities) से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए?

सौरभ मुखर्जी: नहीं, मेरा मतलब यह कतई नहीं है. लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन के लिए इक्विटी सबसे बेहतरीन एसेट क्लास है, लेकिन इसमें निवेश का तरीका अनुशासित और डाइवर्सिफाइड होना चाहिए, न कि सट्टेबाजी जैसा. भारतीय निवेशकों की एक बड़ी गलती यह है कि वे अपना 100% पैसा सिर्फ घरेलू बाजार में लगाते हैं. आपको समझना होगा कि भारत वैश्विक शेयर बाजार का केवल 3% हिस्सा है.

आज के समय में GIFT City जैसे पारदर्शी और टैक्स-एफिशिएंट प्लेटफॉर्म मौजूद हैं, जिनके जरिए आसानी से वैश्विक बाजारों में निवेश किया जा सकता है. अपने पोर्टफोलियो को भौगोलिक रूप से डाइवर्सिफाई करना अब बेहद जरूरी हो गया है.

प्रश्न: एक निवेशक के तौर पर वर्तमान में आपको कौन से सेक्टर्स सबसे आकर्षक लगते हैं और किनसे दूर रहने की सलाह देंगे?

सौरभ मुखर्जी: मुझे इस समय दो क्षेत्रों में सबसे बड़ी संरचनात्मक ग्रोथ दिखाई देती है:

मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्टर्स: कमजोर होता रुपया और वैश्विक कंपनियों की ‘चीन+1’ रणनीति भारत के हक में काम कर रही है. जो भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर निर्यात कर रही हैं, वे आने वाले समय में बेहतरीन प्रदर्शन करेंगी.

हेल्थकेयर इकोसिस्टम: भारत में प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के साथ ही स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च तेजी से बढ़ेगा. इसमें भी प्राइवेट प्लेयर्स की भूमिका अहम होगी. इसलिए कॉर्पोरेट अस्पताल, डायग्नोस्टिक लैब्स, मेडिकल उपकरण निर्माता और फार्मा कंपनियां लंबी अवधि के लिए बेहद मजबूत नजर आती हैं.

इसके विपरीत, मैं बैंकों और एनबीएफसी को लेकर काफी सतर्क हूं. हाल के वर्षों में रिटेल लोन बहुत आक्रामक तरीके से बांटे गए हैं, जिससे आने वाले समय में बैड लोन (NPA) और मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है. साश ही, लोग अब बैंकों में फिक्स डिपॉजिट रखने के बजाय मार्केट में पैसा लगा रहे हैं, जिससे बैंकों के पास डिपॉजिट की कमी हो रही है. इसके अलावा, मैं उन कंपनियों को लेकर भी सावधान रहने की सलाह दूंगा जो पूरी तरह से सरकारी पूंजीगत व्यय या इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च पर निर्भर हैं, क्योंकि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और कमजोर टैक्स कलेक्शन सरकार के बजट पर दबाव डाल सकते हैं.

प्रश्न: आखिरी सवाल, अगले कुछ वर्षों में आप भारतीय अर्थव्यवस्था को किस दिशा में जाते हुए देखते हैं?

सौरभ मुखर्जी: भारत तेजी से एक ‘एंट्रेप्रेन्योरियल’ यानी उद्यमशील अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है. सुरक्षित और बंधी-बंधाई नौकरियों का पुराना दौर अब खत्म हो रहा है. आने वाले समय में जीत उन्हीं की होगी जो लगातार नए स्किल्स सीखेंगे, सट्टेबाजी छोड़कर समझदारी से बचत करेंगे, अपने निवेश को वैश्विक स्तर पर डाइवर्सिफाई करेंगे और आर्थिक रूप से लचीले बने रहेंगे.

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