जामताड़ा: आदिवासी समाज में ढोल, नगाड़ा, मांदर, करताल आदि पारंपरिक वाद्य यंत्रों का आज भी काफी महत्व है. पूजा-पाठ, शादी-विवाह और पर्व-त्योहारों में आदिवासी समाज आज भी अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों का ही उपयोग करते हैं. ये पारंपरिक वाद्य यंत्र आदिवासी संस्कृति से जुड़े हुए हैं.
संथाल परगना में आदिवासी समाज के लोगों की संख्या काफी है. खास आयोजनों पर यहां के आदिवासी पारंपरिक वाद्य यंत्रों का ही उपयोग करते हैं. जामताड़ा में भी आदिवासी बहुल गांवों में आज भी सोहराय, कर्मा, हूल दिवस, शादी समारोह और पूजा-पाठ के अवसर पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई देती है.
क्या कहते हैं आदिवासी संस्कृति के जानकार
आदिवासी संस्कृति के जानकार मनोरथ मरांडी ने कहा कि मांदर, ढोल और नगाड़ा आदिवासी समाज का धार्मिक और सामाजिक प्रतीक है. ढोल, नगाड़ा और पारंपरिक वाद्य यंत्र उनकी संस्कृति की पहचान हैं. प्रकृति की पूजा या जाहेरथान में पूजा के दौरान ढोल, नगाड़ा सहित अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने की परंपरा रही है. उनका मानना है कि उनके पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं.
निशुल्क पारंपरिक वाद्य यंत्रों का वितरण
झारखंड सरकार ने आदिवासी समाज से जुड़े पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बजाने की परंपरा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए खास पहल की है. सरकार की ओर से प्रत्येक आदिवासी पंचायत में मुफ्त में पारंपरिक वाद्य यंत्रों का वितरण किया जा रहा है.

जामताड़ा के साथ-साथ पूरे संथाल परगना प्रमंडल में प्रत्येक आदिवासी पंचायत में झारखंड सरकार द्वारा समारोह आयोजित कर आदिवासियों के बीच पारंपरिक वाद्य यंत्रों का वितरण किया जा रहा है. साथ ही इसके संरक्षण के लिए प्रत्येक पंचायत में धूम कुड़िया भवन का भी निर्माण कराया गया है, जहां पारंपरिक वाद्य यंत्र सुरक्षित रखे जाते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी भी इन वाद्य यंत्रों के बारे में जान सकें और सीख सकें.
क्या कहते हैं साहित्यकार
वहीं इस संबंध में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार सुनील बास्की ने कहा कि पारंपरिक वाद्य यंत्र आदिवासियों के जीवन का एक अभिन्न अंग है. उन्होंने कहा कि पारंपरिक वाद्य यंत्र आदिवासी समाज का एक जीवन का हिस्सा है और इसके बिना वे जी नहीं सकते.

बहरहाल, जो भी हो आज के दौर में जहां कई आधुनिक वाद्य यंत्र बाजार में उपलब्ध हैं और उसका उपयोग भी बढ़-चढ़कर किया जाता है, लेकिन आदिवासी समाज में आज भी पारंपरिक वाद्य यंत्रों का ही उपयोग किया जाता है, जो आदिवासी संस्कृति की भी पहचान है.


