Monday, April 20, 2026

केंद्र सरकार यूपी में ₹6,500 टन पर 20 लाख टन आलू खरीदेगी, साथ ही आंध्र में चना खरीद सीमा और कर्नाटक में तुअर समय सीमा बढ़ाई.

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नई दिल्ली: देश के अन्नदाताओं को बाजार की अनिश्चितताओं और ‘डिस्ट्रेस सेल’ (मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचना) से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर आलू खरीद और आंध्र प्रदेश व कर्नाटक में दलहन खरीद से जुड़े महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दे दी है. यह निर्णय बंपर पैदावार के दौरान कीमतों में होने वाली गिरावट को रोकने के उद्देश्य से लिया गया है.

उत्तर प्रदेश: 20 लाख टन आलू खरीदेगी सरकार
केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश के आलू किसानों को बड़ी राहत देते हुए 20 लाख टन आलू की खरीद को हरी झंडी दिखाई है. यह खरीद ‘बाजार हस्तक्षेप योजना’ (Market Intervention Scheme – MIS) के तहत 6,500.90 रुपये प्रति टन के बाजार हस्तक्षेप मूल्य पर की जाएगी. इस पहल से सरकारी खजाने पर लगभग 203.15 करोड़ रुपये का वित्तीय भार आएगा.

विशेषज्ञों का मानना है कि आलू जैसी जल्द खराब होने वाली फसल के लिए यह न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करना मील का पत्थर साबित होगा, जिससे बिचौलियों के वर्चस्व पर लगाम लगेगी.

आंध्र प्रदेश और कर्नाटक: दलहन किसानों के लिए राहत
दालों के बाजार को स्थिर करने के लिए भी मंत्रालय ने दो प्रमुख निर्णय लिए हैं

आंध्र प्रदेश: राज्य में चने (Gram) की खरीद सीमा को 94,500 टन से बढ़ाकर 1.13 लाख टन कर दिया गया है. यह फैसला राज्य में चने की अतिरिक्त आवक को देखते हुए लिया गया है ताकि अधिक से अधिक किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ उठा सकें.

कर्नाटक: कर्नाटक में तुअर (अरहर) की खरीद अवधि को ‘प्राइस सपोर्ट स्कीम’ (PSS) के तहत 15 मई तक बढ़ा दिया गया है. समय सीमा में इस विस्तार से उन किसानों को अतिरिक्त अवसर मिलेगा जो कटाई या लॉजिस्टिक्स के कारण अब तक अपनी उपज नहीं बेच पाए थे.

कृषि मंत्री का विजन: “किसानों को मिले वाजिब दाम”
राज्यों के कृषि मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक वर्चुअल बैठक के बाद शिवराज सिंह चौहान ने इन प्रस्तावों को आधिकारिक स्वीकृति दी. आधिकारिक बयान में कहा गया कि सरकार का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि फसल की भारी आवक के समय भी किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिले और उन्हें अपनी उपज को औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े.

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