रांची: झारखंड की राजधानी रांची के सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में खून लेने के लिए आये मरीजों के परिजनों की लगी भीड़ में एक परिजन खूंटी जिले के सिम्बुकेल के भी हैं. खेतिहर आदिवासी परिवार की मादेय मुंडू अपने दो वर्ष के थैलेसीमिया से पीड़ित मासूम अभिषेक मुंडा को लेकर आयीं हैं. वह कल भी खूंटी से रांची सदर अस्पताल इस उम्मीद में आई थी कि उनके बच्चे को खून (Packed Red Blood Cells) चढ़ जायेगा. लेकिन कल भी निराशा हाथ लगी और आज भी कहा गया कि खून नहीं है.
हम डोनर कहां से लाएं?
ये कोई अकेली मां नहीं है जो अपने बच्चे को खून चढ़वाने के लिए परेशान है, बल्कि पलामू जिले के छतरपुर (वित्तमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र) से अपने बेटे के इलाज के लिए रांची सदर अस्पताल आए एक शख्स उमेश साव कहते हैं कि उनके बेटे के शरीर मे 04 पॉइंट ही खून बचा है, लेकिन यहां डोनर मांगा जा रहा है. हर महीने खून चढ़वाना पड़ता है, डोनर कहां से लाएं
ईटीवी भारत ने जब स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी से सवाल किया तो उन्होंने यह तो माना कि खून की कमी है, लेकिन उन्होंने यह मानने से इनकर कर दिया कि किसी मरीज को खून नहीं मिल रहा है. यही नहीं बेहद संवेदनशील और जनसरोकार से जुड़ी समस्याओं को स्वास्थ्य मंत्री हल्की बात कहकर टालने की कोशिश करने लगे. उन्होंने भी दावा किया कि अगर किसी मरीज को खून की कमी है तो वह उन्हें दिलवाएंगे. इससे साफ पता चलता है कि स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी को रांची के सदर अस्पताल के बारे में कुछ भी पता नहीं है. ऐसे में पूरे राज्य की क्या स्थिति होगी समझा जा सकता है.
वृहस्पतिवार 30-35 से ज्यादा थैलेसिमिक बच्चे पहुंच गए, इसलिए जिनको सबसे ज्यादा जरूरत थी, उन्हें ब्लड उपलब्ध कराया गया- डॉ बिमलेश सिंह, उपाधीक्षक-सदर अस्पताल
रांची सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में खून की उपलब्धता पहले से बेहतर होने की बात कहते हुए सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ बिमलेश सिंह ने कहा कि जिन बच्चों के जीवन को बचाने के लिए ज्यादा जरूरी था पहले उनको PRBC उपलब्ध कराया गया है. आज 30-35 से ज्यादा थैलेसिमिक बच्चे अपने माता-पिता के साथ पहुंच गए थे, ऐसे में जिनका हीमोग्लोबिन बहुत कम था उन्हें पहले खून उपलब्ध करा रहे हैं.

दूसरे जिले से खून के लिए रांची सदर अस्पताल क्यों पहुंच रहे हैं थैलेसिमिक मरीज?
राज्य के हजारों थैलेसिमिक बच्चों को खून उपलब्ध नहीं हो पा रहा है इसलिए पलामू, गुमला, खूंटी, गढ़वा, गिरिडीह और अन्य जिलों से महज एक यूनिट खून के लिए थैलेसिमिक बच्चों और उनके माता-पिता को रांची पहुंच रहे हैं. यही नहीं राजधानी रांची से भी उन्हें बैरंग वापस होना पड़ रहा है. खास बात ये है कि स्वास्थ्य मंत्री को जानकारी देने के बाद भी वे इसे हल्का बताते हुए टालने की कोशिश कर रहे हैं.
साहिबगंज जिले के बरहेट प्रखंड के निवासी नरेश प्रसाद साह के दो बच्चे थैलेसीमिया की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं. इन दोनों बच्चों को हर महीने नियमित रूप से दो-दो यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है. रक्त की कमी के कारण एक महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उन्हें ट्रांसफ्यूजन नहीं मिल पाया.
इस स्थिति में नरेश ने सोमवार को जिला सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में जाकर स्वयं अपना रक्तदान किया और उसे जांच के लिए रांची भेज दिया. लेकिन दूसरे बच्चे के लिए अभी भी रक्त की व्यवस्था नहीं हो पाई है, जिससे वे बेहद चिंतित और निराश हैं.
नरेश ने बताया कि उनके कुल तीन बच्चे हैं. बड़ी बेटी मधु कुमारी (8 वर्ष) और छोटा बेटा सत्यम कुमार (6 वर्ष) तीन साल की उम्र में थैलेसीमिया से प्रभावित पाए गए थे, जबकि सबसे छोटी बेटी पूरी तरह स्वस्थ है. परिवार के इतिहास में पहले कभी इस बीमारी का कोई मामला नहीं था. उन्होंने कहा कि बेटी के लिए तो उन्होंने खुद रक्त दान कर दिया है, लेकिन बेटे की हालत को लेकर वे बहुत परेशान हैं और रक्त की तलाश में हैं.
क्या होता है थैलेसीमिया की बीमारी
थैलेसीमिया एक जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है जो माता-पिता से बच्चों में जाता है. इसमें शरीर के हीमोग्लोबिन बनाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे शरीर में पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं (RBCs) नहीं बन पातीं. इसलिए थैलेसीमिया में बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है. हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद वह प्रोटीन है जो पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाता है, थैलेसीमिया के मरीजों में दोषपूर्ण जीन के कारण हीमोग्लोबिन या तो बहुत कम बनता है या बिल्कुल नहीं बनता, जिससे शरीर के अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाता.
थैलेसीमिया के मरीजों को नियमित रूप से रक्त चढ़ाना पड़ता है
एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की उम्र लगभग 120 दिन होती है लेकिन थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्ति में ये कोशिकाएं बहुत कमजोर होती हैं और अपनी सामान्य आयु से पहले ही (मात्र 20 दिनों में) टूट जाती हैं. थैलेसीमिया (गंभीर रूप वाले) मरीजों को जीवित रहने और सामान्य विकास के लिए नियमित रूप से रक्त चढ़ाना पड़ता है, सामान्यतः आमतौर पर उन्हें हर 2 से 4 सप्ताह में खून चढ़ाने (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की आवश्यकता होती है ताकि शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बना रहे.


