Sunday, April 26, 2026

माध्यमिक शिक्षा में छात्र-छात्राओं का ड्राप आउट की दर 6.9 प्रतिशत रहा, हालांकि माध्यमिक स्तर पर लड़कियों की ड्रॉपआउट दर में उल्लेखनीय कमी आई है।

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 बिहार में नीतीश सरकार के प्रयासों के बावजूद शिक्षा क्षेत्र में बड़ी चुनौतियां कायम हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर चिंताजनक है, हालांकि माध्यमिक स्तर पर लड़कियों की ड्रॉपआउट दर में उल्लेखनीय कमी आई है। उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात बढ़ाना भी एक चुनौती है। रिपोर्ट में बच्चों के नामांकन में सकारात्मक रुझान और कौशल विकास पर जोर देने की बात कही गई है, लेकिन समस्या से निपटने के लिए और प्रयासों की आवश्यकता है

पटना।  प्रदेश में सबको अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की दिशा में भले ही नीतीश सरकार ने 2007 से अब तक कई बड़े कदम उठाया है, लेकिन इसके बाद भी प्रारंभिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा तथा तकनीकी शिक्षा की राह में अब भी बड़ी चुनौतियां कायम हैं।

इसकी नजीर आर्थिक सर्वेक्षण, 2025-26 की रिपोर्ट है जिसमें स्कूली शिक्षा के सामने ड्राप आउट को बखूबी दर्शाया गया है।

हालांकि, सरकार मानती है कि वर्ष 2005-06 से पहले बिहार में बच्चों का ड्राप आउट की दर तुलना में आज बड़ी सफलता मिली है।

फिर भी रिपोर्ट में प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा में शत-प्रतिशत ड्राप आउट को खत्म करने की चुनौती का बखूबी चर्चा है।

वहीं राज्य में उच्च शिक्षा के सामने अपने सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को बढ़ाने की बड़ी चुनौती है। अभी उच्च शिक्षा में जीईआर करीब 20 प्रतिशत है।

पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर चिंता की बात

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा में 2024-25 में बच्चों का ड्राप आउट 2.9 प्रतिशत रहा। इसमें लड़कियों का 1.2 प्रतिशत तथा लड़कों का 4.5 प्रतिशत था।

इसी प्रकार उच्च प्राथमिक में बच्चों का ड्राप आउट की दर 9.3 प्रतिशत रहा। इसमें लड़कियां 6.6 एवं लड़कों का 11.9 प्रतिशत था।

माध्यमिक शिक्षा में छात्र-छात्राओं का ड्राप आउट की दर 6.9 प्रतिशत रहा। इसमें अच्छी बात यह रही कि माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का ड्राप आउट की दर 13.56 प्रतिशत तेजी से घटी है।

कार्य योजना बनाने पर बल

आर्थिक सर्वे में पढ़ाई बीच में छोड़ने के लिए जिम्मेदार कारक के तौर पर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक और अवसंरचनात्मक श्रेणियों को बताया गया है।

यह सुझाव भी दिया गया है कि पढ़ाई बीच में छोड़ने की समस्या से निपटने के लिए सावधानीपूर्वक योजना बनाना आवश्यक है, जिसमें जोखिम वाले छात्रों की पहचान और सहायता के लिए निवारक उपाय और लक्षित हस्तक्षेप दोनों शामिल हों।

इससे साफ है कि बड़ी संख्या में बच्चे बारहवीं तक आते-आते पढ़ाई अभीभी छोड़ देते है। इसका कारण बोर्ड परीक्षाओं में फेल होने सहित बड़ी संख्या में बच्चों की आर्थिक स्थिति का ठीक न होना भी होता है।

ऐसे में वह मेहनत-मजदूरी जैसे कामों में लग जाते हैं। सरकार इस समस्या से निपटने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन सर्वेक्षण में उनके प्रयासों को नाकाफी बताते हुए इनमें और तेजी लाने की राह दिखाई गई है।

नामांकन दर में सकारात्मक रुझान

रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर बच्चों के नामांकन सकारात्मक रुझान देखने को मिला।

वर्ष 2024-25 में प्राथमिक स्तर पर बच्चों का कुल नामांकन एक करोड़ 59 लाख 22 हजार है, जिनमें से 80.87 लाख लड़के और 78.35 लाख लड़कियां हैं।

वहीं माध्यमिक में 27 लाख 54 हजार और उच्च माध्यमिक स्तर पर 20 लाख 33 हजार नामांकन दर्ज हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक माध्यमिक स्तर पर 2021-22 और 2024-25 के बीच पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर में 13.56 प्रतिशत अंकों की तीव्र गिरावट आई है।

विशेष रूप से, इस अवधि के दौरान, लड़कियों में पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर में गिरावट लड़कों की तुलना में अधिक रही है।

अच्छी पहल की भी चर्चा

आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में युवाओं को मानव संसाधन के रूप में तैयार करने की हालिया पहल की भी बखूबी चर्चा है। युवाओं को कौशल विकास, व्यावसायिक शिक्षा, इंटर्नशिप और उद्योग सहयोग पर जोर दिया जा रहा है ताकि शिक्षा को रोजगार से जोड़ा जा सके।

तकनीकी शिक्षण संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए उठाये जा रहे सुधारात्मक कदम की सराहना की गई है।

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