Tuesday, November 3, 2026

अब बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रही टाइप 2 डायबिटीज, बदलती जीवनशैली और खान-पान बढ़ा रहे चिंता

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Health News | 2 नवंबर 2026: डायबिटीज को आमतौर पर वयस्कों से जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन अब कम उम्र में भी टाइप 2 डायबिटीज के मामले सामने आ रहे हैं। बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी, खान-पान की आदतें और आनुवंशिक कारण बच्चों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन रहे हैं।

बचपन में खेलना-कूदना और सक्रिय रहना शारीरिक विकास के साथ-साथ बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है। लेकिन लंबे समय तक मोबाइल, टीवी और अन्य डिजिटल स्क्रीन पर समय बिताने तथा असंतुलित खान-पान के कारण बच्चों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ये आदतें टाइप 2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।

बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज होने की प्रमुख वजहें

टाइप 2 डायबिटीज ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो रक्त में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। कोशिकाएं इसी ग्लूकोज का इस्तेमाल ऊर्जा प्राप्त करने के लिए करती हैं।

जब शरीर में इंसुलिन के प्रति कोशिकाओं की प्रतिक्रिया कमजोर होने लगती है, तो रक्त में शुगर का स्तर बढ़ सकता है। इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है।

बच्चों में इस समस्या का खतरा बढ़ाने वाले कुछ प्रमुख कारक हैं:

  • शारीरिक गतिविधियों की कमी: लंबे समय तक बैठे रहना और खेल-कूद से दूरी बनाना।
  • असंतुलित खान-पान: जंक फूड, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ और अधिक चीनी वाले पेय व स्नैक्स का नियमित सेवन।
  • अधिक वजन: शरीर में अतिरिक्त वसा, विशेषकर पेट के आसपास वसा जमा होना।
  • आनुवंशिक कारण: परिवार में माता-पिता या अन्य करीबी सदस्यों को टाइप 2 डायबिटीज होना।
  • नींद की समस्या: पर्याप्त और नियमित नींद नहीं लेना भी चयापचय संबंधी स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

रिपोर्ट में उद्धृत अध्ययन के अनुसार, 3 से 18 वर्ष की उम्र के बच्चों में 8.40 प्रतिशत को टाइप 2 डायबिटीज और 12.40 प्रतिशत को मोटापे से प्रभावित बताया गया है। हालांकि, इन आंकड़ों की व्यापकता समझने के लिए अध्ययन का क्षेत्र, नमूना और शोध-पद्धति जानना जरूरी है।

बच्चों में दिख सकते हैं ये शुरुआती संकेत

टाइप 2 डायबिटीज की शुरुआत कई बार धीरे-धीरे होती है। कुछ बच्चों में शुरुआती दौर में स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। फिर भी कुछ बदलावों पर ध्यान देना जरूरी है।

1. बार-बार पेशाब आना: रक्त में शुगर बढ़ने पर शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को पेशाब के जरिए बाहर निकालने की कोशिश करता है। इससे पेशाब की आवृत्ति बढ़ सकती है।

2. सामान्य से ज्यादा प्यास लगना: बार-बार पेशाब आने के कारण शरीर में पानी की कमी हो सकती है। ऐसे में बच्चे को बार-बार प्यास लग सकती है।

3. लगातार थकान महसूस होना: शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा का सही इस्तेमाल करने में परेशानी होने से बच्चे को थकान या सुस्ती महसूस हो सकती है।

4. धुंधला दिखाई देना: रक्त में शुगर के स्तर में बदलाव से आंखों के लेंस प्रभावित हो सकते हैं और कुछ समय के लिए नजर धुंधली हो सकती है।

5. त्वचा पर गहरे और मोटे धब्बे: गर्दन, बगल या शरीर की सिलवटों में त्वचा का मोटा और गहरा होना एकेन्थोसिस निग्रिकन्स कहलाता है। यह इंसुलिन रेजिस्टेंस का संकेत हो सकता है।

6. बिना स्पष्ट वजह वजन में बदलाव: अचानक या अनजाने में वजन कम होना भी जांच की जरूरत का संकेत हो सकता है।

7. घाव भरने में देरी: रक्त में शुगर का स्तर लंबे समय तक अधिक रहने पर घाव भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

इनमें से कोई लक्षण दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे को निश्चित रूप से डायबिटीज है। सही स्थिति जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

किन बच्चों में जोखिम अधिक हो सकता है?

कुछ परिस्थितियों में बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज होने की आशंका बढ़ सकती है। इनमें शामिल हैं:

  • जिन बच्चों की शारीरिक गतिविधियां बहुत कम हैं और जो अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं।
  • जिनके खान-पान में फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स और अधिक मीठी चीजें शामिल हैं।
  • जिनके परिवार में टाइप 2 डायबिटीज का इतिहास रहा है।
  • जिन बच्चों में अधिक वजन या मोटापे की समस्या है।
  • समय से पहले जन्म या कम जन्म वजन जैसी कुछ शुरुआती स्वास्थ्य परिस्थितियां भी आगे चलकर चयापचय संबंधी जोखिम से जुड़ी हो सकती हैं।

हालांकि, इन कारकों में से कोई एक मौजूद होने का अर्थ यह नहीं है कि बच्चे को डायबिटीज हो ही जाएगी।

बच्चों को स्वस्थ रखने के लिए अभिभावक क्या करें?

बच्चों की दिनचर्या में छोटे और नियमित बदलाव उनके स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकते हैं। अभिभावक इन बातों पर ध्यान दे सकते हैं:

संतुलित भोजन दें: बच्चों के आहार में घर का बना खाना, मौसमी फल, सब्जियां, हरी पत्तेदार सब्जियां और साबुत अनाज शामिल करें। मीठे पेय और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखें।

खेल-कूद को बढ़ावा दें: बच्चों को उनकी उम्र और क्षमता के अनुसार रोजाना शारीरिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करें। बाहर खेलना, साइकिल चलाना और सक्रिय खेल उपयोगी हो सकते हैं।

स्क्रीन टाइम सीमित रखें: मोबाइल, टीवी और वीडियो गेम के बीच संतुलन बनाएं। बच्चों को दूसरी रचनात्मक और शारीरिक गतिविधियों के लिए भी समय दें।

पर्याप्त नींद जरूरी: बच्चों की उम्र के अनुसार नियमित और पर्याप्त नींद की आदत विकसित करें।

लक्षण दिखने पर डॉक्टर से मिलें: अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब, लगातार थकान या अन्य असामान्य बदलाव दिखने पर बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लें। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर रक्त शर्करा की जांच करा सकते हैं।

समय पर पहचान और सही आदतें हैं जरूरी

बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज का जोखिम केवल खान-पान से नहीं जुड़ा है। पारिवारिक इतिहास, शारीरिक गतिविधि, नींद और अन्य स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां भी इसमें भूमिका निभाती हैं। इसलिए बच्चों को दोष देने या उनके वजन को लेकर दबाव बनाने के बजाय पूरे परिवार की दिनचर्या को स्वस्थ बनाना अधिक उपयोगी है।

समय पर चिकित्सकीय सलाह, संतुलित भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधियों से बच्चों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

Bharat Superfast News | Health Desk


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