Saturday, October 24, 2026

Sharad Purnima 2026: शरद पूर्णिमा का महत्व, रासलीला की कथा और चांदनी में खीर रखने की परंपरा.

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धर्म डेस्क | 24 अक्टूबर 2026 | BHARATSUPERFASTNEWS

Sharad Purnima 2026: हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व है। हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस पर्व को रास पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा और कौमुदी महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा की चांदनी विशेष शुभ मानी जाती है। इसी वजह से लोग खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

शरद पूर्णिमा पर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा की जाती है। इस पर्व से भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला की कथा भी जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा का महत्व, इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं और चांदनी में खीर रखने की परंपरा के बारे में।

शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?

ज्योतिषाचार्य डॉ. उमाशंकर मिश्र के अनुसार, शरद पूर्णिमा से कई धार्मिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। एक प्रचलित कथा में मगध के राजा धनंजय का उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार, उनके राज्य में बारिश की कमी और बीमारियों के कारण संकट उत्पन्न हो गया था।

ऐसी स्थिति में पुरोहित की सलाह पर राजा और रानी ने शरद पूर्णिमा का व्रत रखा। उन्होंने रातभर जागकर माता लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा की। कथा के अनुसार, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर चंद्र देव ने राज्य को संकट से मुक्ति का आशीर्वाद दिया, जबकि माता लक्ष्मी ने सुख-समृद्धि का वरदान दिया।

इस कथा को शरद पूर्णिमा पर व्रत रखने और देवी लक्ष्मी तथा चंद्र देव की पूजा करने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह एक धार्मिक मान्यता है, जिसका महत्व श्रद्धालुओं की आस्था में निहित है।

भगवान कृष्ण की महारास लीला से जुड़ी है मान्यता

शरद पूर्णिमा की एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से संबंधित है। ब्रज क्षेत्र में इस कथा का विशेष महत्व है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में राधा और गोपियों के साथ दिव्य रासलीला की थी। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की बांसुरी की मधुर ध्वनि सुनकर गोपियां उनकी ओर आकर्षित हुईं और उनके साथ महारास में शामिल हुईं।

इस प्रसंग को भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक माना जाता है। श्रीकृष्ण के भक्त इस रात को विशेष रूप से याद करते हैं और कई स्थानों पर रासलीला से जुड़े धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा का क्या महत्व है?

शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणें अमृत के समान गुणों वाली मानी जाती हैं।

इसी विश्वास के कारण श्रद्धालु रात में चंद्रमा के दर्शन करते हैं, अर्घ्य देते हैं और सुख-शांति की कामना करते हैं। वैदिक ज्योतिष में भी चंद्रमा को मन और भावनाओं से जोड़कर देखा जाता है।

हालांकि, चंद्रमा की किरणों से बीमारियां ठीक होने या शरीर को विशेष औषधीय लाभ मिलने के दावों की पुष्टि वैज्ञानिक प्रमाणों से नहीं हुई है। इसलिए इन बातों को धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं के रूप में समझना चाहिए।

माता लक्ष्मी की पूजा से जुड़ी है समृद्धि की कामना

शरद पूर्णिमा को माता लक्ष्मी की आराधना के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी पूजा करने वाले भक्तों पर कृपा करती हैं। इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है।

श्रद्धालु इस अवसर पर घरों की साफ-सफाई करते हैं, दीपक जलाते हैं और माता लक्ष्मी तथा भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। पूजा के दौरान धन-धान्य, सुख-शांति और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती है।

कुछ परंपराओं में संतान सुख और वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए भी शरद पूर्णिमा का व्रत रखा जाता है। हालांकि, व्रत रखने से संतान प्राप्ति या मनचाहा जीवनसाथी मिलने की कोई वैज्ञानिक गारंटी नहीं है। ये धार्मिक आस्था से जुड़ी मान्यताएं हैं।

चांदनी में खीर रखने की परंपरा के पीछे क्या है रहस्य?

शरद पूर्णिमा की सबसे प्रसिद्ध परंपराओं में से एक है रात में खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखना। धार्मिक विश्वास के अनुसार, इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृततुल्य गुण होते हैं। इसी कारण खीर को चांदनी में रखकर अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

परंपरा के अनुसार, दूध, चावल और चीनी से खीर तैयार की जाती है। पहले इसे भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी या अपने आराध्य देव को अर्पित किया जाता है। इसके बाद साफ बर्तन में रखकर चांदनी में रखने की परंपरा निभाई जाती है।

खीर को खुले में रखते समय स्वच्छता का ध्यान रखना जरूरी है। बर्तन को जालीदार ढक्कन से ढकें, ताकि धूल और कीड़े-मकोड़े उसमें न गिरें। दूध से बनी खीर जल्दी खराब हो सकती है, इसलिए उसे पूरी रात गर्म वातावरण में छोड़ने से बचें। सुरक्षित तापमान पर रखना जरूरी है।

शरद पूर्णिमा पर पूजा कैसे करें?

शरद पूर्णिमा पर पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती है। सामान्य रूप से श्रद्धालु इन चरणों का पालन करते हैं:

  1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. पूजा स्थल की सफाई कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. दीपक जलाकर फूल, धूप और फल अर्पित करें।
  4. अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का संकल्प लें।
  5. शाम को चंद्रमा के दर्शन होने पर जल अर्पित करें और प्रार्थना करें।
  6. दूध और चावल से खीर बनाकर अपने आराध्य देव को भोग लगाएं।
  7. खीर को स्वच्छ और सुरक्षित तरीके से चांदनी में रखने की परंपरा निभाएं।
  8. अगले दिन खीर को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटें।

शरद पूर्णिमा 2026 की तारीख और तिथि

ज्योतिषाचार्य डॉ. उमाशंकर मिश्र के हवाले से दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह समाप्त होगी। इस कारण पर्व की तिथि और पूजा के समय को लेकर लोगों में भ्रम हो सकता है।

शरद पूर्णिमा की पूजा और चांदनी में खीर रखने का समय तय करने से पहले अपने शहर के पंचांग की जांच कर लें। तिथि और मुहूर्त की गणना स्थान के अनुसार अलग हो सकती है।

आस्था, परंपरा और परिवार के साथ उत्सव

शरद पूर्णिमा केवल चंद्रमा की पूजा या खीर रखने तक सीमित नहीं है। यह पर्व धार्मिक आस्था, पारिवारिक एकता और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से भी जुड़ा हुआ है। इस अवसर पर श्रद्धालु माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं, चंद्र देव को अर्घ्य देते हैं और परिवार के साथ प्रसाद बांटते हैं।

धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए स्वच्छता, स्वास्थ्य और सुरक्षित भोजन का ध्यान रखना भी जरूरी है। स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय तय करके श्रद्धालु शरद पूर्णिमा का पर्व अपनी पारिवारिक परंपराओं के साथ मना सकते हैं।

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