India-South Korea Economic Relations: भारत और दक्षिण कोरिया के बीच आर्थिक साझेदारी को नई गति देने की दिशा में एक अहम पहल सामने आई है। दक्षिण कोरिया के व्यापार, उद्योग और संसाधन मंत्रालय ने भारत के साथ औद्योगिक सहयोग मजबूत करने के लिए एक विशेष विभाग का गठन किया है। इस कदम से भारतीय बाजार में कोरियाई कंपनियों की भागीदारी बढ़ने और नए निवेश के अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
भारत में सैमसंग और हुंडई जैसे दक्षिण कोरियाई ब्रांड पहले से ही अपनी मजबूत पहचान बना चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता उत्पादों के अलावा कोरियाई मनोरंजन, खानपान और ब्यूटी इंडस्ट्री की लोकप्रियता भी भारतीय बाजार में बढ़ी है। अब दोनों देश इस बढ़ती नजदीकी को आर्थिक सहयोग और औद्योगिक निवेश में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
कोरियाई कंपनियों के लिए भारत में कारोबार करना होगा आसान
दक्षिण कोरिया की नई पहल का एक प्रमुख उद्देश्य उन कंपनियों को भारतीय बाजार में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना है, जिन्हें स्थानीय नियमों, कारोबारी प्रक्रियाओं और व्यावसायिक नेटवर्क की पर्याप्त जानकारी नहीं है।
इस दिशा में भारत में एक विशेष कोरियाई औद्योगिक क्षेत्र या टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। इस क्षेत्र में कंपनियों को तैयार औद्योगिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है। इसे ‘प्लग-एंड-प्ले’ मॉडल पर विकसित करने की अवधारणा है, जिसके तहत कंपनियां बुनियादी ढांचे की व्यवस्था करने में कम समय खर्च करके अपने कारोबार पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।
इसका लाभ विशेष रूप से दक्षिण कोरिया के छोटे और मध्यम आकार के उद्योगों को मिल सकता है। बड़ी कंपनियों के मुकाबले इन उद्यमों के लिए दूसरे देशों में कारोबार शुरू करना अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में तैयार औद्योगिक सुविधाएं और बेहतर संस्थागत सहयोग उनके लिए भारतीय बाजार में प्रवेश आसान बना सकते हैं।
भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों को नई दिशा देने की तैयारी
अप्रैल 2026 में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग की भारत यात्रा के दौरान औद्योगिक सहयोग और प्रस्तावित कोरियाई औद्योगिक क्षेत्र जैसे विषयों पर चर्चा हुई थी। दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाने के लिए कई अन्य पहलुओं पर भी सहमति बनने की बात सामने आई।
कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक पॉलिसी में भारत और दक्षिण एशिया से जुड़े शोध कार्यों का नेतृत्व करने वाले क्युंगहून किम के अनुसार, नया विभाग भारत के साथ दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करने की दक्षिण कोरिया की मंशा को दर्शाता है।
उनके मुताबिक, दोनों देश एक औद्योगिक सहयोग समिति बनाने और रणनीतिक क्षेत्रों में साझेदारी का विस्तार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही, वर्ष 2010 में लागू व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) को बेहतर बनाने के लिए बातचीत दोबारा शुरू करने पर भी सहमति बनी।
नए विभाग की भूमिका इन पहलों के बीच समन्वय स्थापित करने और समझौतों को व्यावहारिक स्तर पर लागू करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 54 अरब डॉलर पहुंचाने का लक्ष्य
भारत और दक्षिण कोरिया के आर्थिक संबंधों का विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब दोनों देश व्यापार को मौजूदा स्तर से काफी आगे ले जाना चाहते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 25.6 अरब डॉलर रहा। इसे वर्ष 2030 तक बढ़ाकर 54 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा गया है।
दोनों देशों के बीच कारोबार में कई तरह के औद्योगिक उत्पादों का आदान-प्रदान होता है।
भारत से दक्षिण कोरिया को निर्यात होने वाले प्रमुख उत्पादों में शामिल हैं:
- पेट्रोलियम उत्पाद, जिनमें नेफ्था भी शामिल है
- इंजीनियरिंग से जुड़े सामान
- दवाइयां और औषधीय उत्पाद
- एल्युमीनियम
- स्टील और उससे जुड़े उत्पाद
दक्षिण कोरिया से भारत आने वाले प्रमुख उत्पादों में शामिल हैं:
- इंटीग्रेटेड सर्किट और सेमीकंडक्टर
- औद्योगिक मशीनरी
- ऑटोमोबाइल के कलपुर्जे
- इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अन्य औद्योगिक उत्पाद
व्यापार बढ़ाने के साथ-साथ दोनों देशों के सामने निवेश, तकनीकी सहयोग और विनिर्माण क्षेत्र में साझेदारी को मजबूत करने का अवसर भी है।
हुंडई का बड़ा निवेश, मैन्युफैक्चरिंग को मिल सकता है बढ़ावा
भारत में दक्षिण कोरियाई कंपनियों की दिलचस्पी का एक प्रमुख उदाहरण हुंडई मोटर ग्रुप की निवेश योजना है। कंपनी ने 2026 से 2032 के बीच भारत में विनिर्माण और अनुसंधान एवं विकास (R&D) गतिविधियों के लिए 15.5 अरब डॉलर के निवेश की योजना घोषित की है।
इस तरह की योजनाएं भारतीय औद्योगिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं। नए निवेश से उत्पादन क्षमता बढ़ाने, तकनीकी विशेषज्ञता विकसित करने और स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के लिए कारोबारी अवसर पैदा होने की संभावनाएं बनती हैं।
हालांकि, निवेश की वास्तविक आर्थिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित योजनाएं किस गति से लागू होती हैं और उनसे स्थानीय उद्योगों को कितना लाभ मिलता है।
भारत के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करना विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भागीदारी बढ़ाने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दक्षिण कोरियाई कंपनियों के साथ सहयोग से इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, उन्नत तकनीक और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
भारतीय बाजार दक्षिण कोरियाई कंपनियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
दक्षिण कोरिया की घरेलू अर्थव्यवस्था में कंपनियों को विकास के नए अवसर तलाशने की जरूरत है। लगभग पांच करोड़ की आबादी वाले इस देश में कई उपभोक्ता उत्पादों का बाजार अपेक्षाकृत परिपक्व हो चुका है। ऐसे में कंपनियां अपने कारोबार के विस्तार के लिए बड़े विदेशी बाजारों की ओर देख रही हैं।
भारत अपनी विशाल आबादी, बढ़ती उपभोक्ता मांग और औद्योगिक विकास की संभावनाओं के कारण दक्षिण कोरियाई कंपनियों के लिए आकर्षक विकल्प बनता है।
पूर्व राजनयिक और इंडिया-आरओके फ्रेंडशिप सोसाइटी के उपाध्यक्ष सी. राजशेखर के अनुसार, दोनों देशों को ऐसा आर्थिक ढांचा विकसित करने की जरूरत है, जो केवल व्यापार बढ़ाने तक सीमित न रहे, बल्कि लंबे समय तक निवेश और औद्योगिक साझेदारी को भी प्रोत्साहित करे।
उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच लगातार संवाद और बेहतर कारोबारी समन्वय से दक्षिण कोरिया से भारत आने वाले निवेश को नई गति मिल सकती है।
छोटे और मध्यम उद्योगों के सामने क्या हैं चुनौतियां?
भारत में कारोबार की संभावनाएं होने के बावजूद दक्षिण कोरिया के छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों के लिए यहां अपनी मौजूदगी स्थापित करना आसान नहीं है।
स्थानीय बाजार की समझ, नियामकीय प्रक्रियाएं, व्यावसायिक संपर्क और संचालन संबंधी व्यवस्थाएं ऐसी चुनौतियां हैं, जिनसे नए विदेशी निवेशकों को जूझना पड़ सकता है।
क्युंगहून किम के अनुसार, कई कोरियाई कंपनियां भारत की विनिर्माण क्षमता और बाजार की संभावनाओं को पहचानती हैं, लेकिन उनके पास यहां काम करने का पर्याप्त अनुभव नहीं है।
प्रस्तावित औद्योगिक टाउनशिप इस समस्या का समाधान निकालने में मदद कर सकती है। यदि कंपनियों को बुनियादी सुविधाओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और स्थानीय कारोबारी संपर्कों के मामले में सहयोग मिलता है, तो भारत में निवेश संबंधी फैसले लेना उनके लिए आसान हो सकता है।
हालांकि, इस पहल की सफलता के लिए जरूरी होगा कि औद्योगिक सुविधाओं के साथ-साथ कंपनियों को नियामकीय स्पष्टता और व्यावहारिक सहायता भी मिले।
व्यापार से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी पर जोर
भारत और दक्षिण कोरिया के संबंध केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश महत्वपूर्ण खनिजों, उभरती प्रौद्योगिकियों और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने के अवसर तलाश रहे हैं।
मई 2026 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सियोल यात्रा के दौरान रक्षा क्षेत्र में संयुक्त विकास, उत्पादन और निर्यात को प्रोत्साहित करने के विकल्पों पर चर्चा हुई थी।
दोनों देशों के बीच सहयोग का विस्तार ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा और विविधीकरण पर जोर बढ़ रहा है। भारत विभिन्न देशों के साथ औद्योगिक संबंध मजबूत करके अपनी विनिर्माण क्षमता बढ़ाना चाहता है। वहीं, दक्षिण कोरियाई कंपनियों को भारत जैसे बड़े बाजार में उत्पादन और बिक्री का विस्तार करने का अवसर मिल सकता है।
आगे क्या बदल सकता है?
दक्षिण कोरिया के मंत्रालय में नए विभाग का गठन भारत के साथ आर्थिक संबंधों को संस्थागत रूप से मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके साथ प्रस्तावित औद्योगिक टाउनशिप और व्यापार समझौते को बेहतर बनाने की कोशिशें आगे बढ़ती हैं, तो दोनों देशों के बीच निवेश के नए रास्ते खुल सकते हैं।
भारत के लिए इसका संभावित लाभ अधिक विदेशी निवेश, विनिर्माण क्षेत्र में विस्तार और तकनीकी सहयोग के रूप में सामने आ सकता है। दक्षिण कोरिया की कंपनियों को भी अपने उत्पादों के लिए बड़ा बाजार और क्षेत्रीय उत्पादन केंद्र विकसित करने का अवसर मिल सकता है।
हालांकि, इन संभावनाओं को वास्तविक आर्थिक लाभ में बदलने के लिए नीतिगत समन्वय, कारोबारी प्रक्रियाओं में स्पष्टता और निवेश योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ता आर्थिक सहयोग दोनों देशों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई संस्थागत पहल और प्रस्तावित औद्योगिक सुविधाएं द्विपक्षीय व्यापार तथा निवेश के निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में कितनी मदद करती हैं।
