रांची: संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत आज, 3 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। धार्मिक परंपरा में इस दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व माना गया है।
जितिया व्रत की परंपरा तीन दिनों में पूरी होती है। इस दौरान नहाय-खाय, निर्जला उपवास और इसके बाद पारण की प्रक्रिया शामिल होती है।
जितिया व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जीमूतवाहन की आराधना और जितिया व्रत करने से संतान की रक्षा तथा उसकी दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। व्रत से जुड़ी परंपराओं में संयम, श्रद्धा और नियमों के पालन को विशेष महत्व दिया जाता है।
पूजा के लिए शुभ समय
जितिया व्रत के दिन पूजा और धार्मिक अनुष्ठान के लिए अलग-अलग मुहूर्त बताए गए हैं। आपके दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार समय इस प्रकार है—
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:38 बजे से 5:26 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक
- प्रदोष काल: शाम 6:05 बजे से रात 8:29 बजे तक
जितिया पूजा के लिए प्रदोष काल और सूर्यास्त के बाद का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर संभव है।
4 अक्टूबर को होगा व्रत का पारण
जितिया व्रत का पारण 4 अक्टूबर 2026, रविवार को किया जाएगा। दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार सुबह 7:28 बजे के बाद पारण किया जा सकेगा।
व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पारण के समय की पुष्टि कर लेना उचित रहेगा।
तीन दिनों की होती है व्रत की परंपरा
पहला दिन: नहाय-खाय
व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि से होती है। इस दिन स्नान के बाद सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है और अगले दिन के उपवास की तैयारी की जाती है।
दूसरा दिन: जितिया व्रत
अष्टमी तिथि को मुख्य व्रत रखा जाता है। परंपरा के अनुसार महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करती हैं।
तीसरा दिन: पारण
नवमी तिथि को पूजा-अर्चना और सूर्यदेव को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलने की परंपरा है। इसी के साथ तीन दिवसीय जितिया व्रत का समापन होता है।
जितिया से जुड़ी प्रमुख कथाएं
जितिया व्रत की धार्मिक परंपरा में राजा जीमूतवाहन की कथा के साथ-साथ चील-सियारिन की कथा भी सुनाई जाती है। मान्यता है कि राजा जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए त्याग और बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत किया था।
वहीं चील और सियारिन से जुड़ी कथा में व्रत के नियमों, श्रद्धा और आस्था के महत्व को बताया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इन कथाओं के वर्णन और पूजा की स्थानीय परंपराओं में अंतर भी देखने को मिलता है।
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